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Home बिहार कैमूर विकास पर करोड़ों खर्च, फिर भी जाने के लिए रास्ता नहीं

विकास पर करोड़ों खर्च, फिर भी जाने के लिए रास्ता नहीं

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विकास पर करोड़ों खर्च, फिर भी जाने के लिए रास्ता नहीं

भभुआ नगर. देश आजाद हुए 75 वर्ष हो गये, लेकिन अधौरा व चैनपुर प्रखंड के पहाड़ी पर स्थित गांवों का विकास अब भी नहीं हुआ है. अधौरा व चैनपुर प्रखंड के पहाड़ी पर स्थित अधिकतर गांवों में जाने के लिए न ही सड़क बनी है, न ही बिजली की व्यवस्था है और न ही शुद्ध जल पीने को मिले. हालांकि, सड़क, बिजली सहित अधौरा प्रखंडवासियों को पीने के लिए शुद्ध पानी मिले, इस पर सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किये गये हैं, लेकिन स्थिति अब भी अधौरा प्रखंड के अधिकतर गांवों की खराब है. आज भी बरसात के दिनों में अधौरा प्रखंड के सभी गांव में वाहन नहीं पहुंच सकते. हालांकि, कई गांव तक तो जून महीने में भी वाहन नहीं पहुंच सकते, जबकि सरकार का लक्ष्य है कि प्रत्येक गांव को सड़क से जोड़ना है. इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि वनवासी विकास की राह से आज भी कोसों दूर हैं. जबकि, गांव तक जाने के लिए प्रत्येक वर्ष सड़क निर्माण पर वन विभाग द्वारा लाखों रुपये खर्च किया जाता है, इसके बावजूद कई गांवों तक वाहन पहुंचाना आज भी नामुमकिन है. गांव में सड़क, बिजली, पानी व नेटवर्क की व्यवस्था नहीं रहने के कारण अधौरा प्रखंड के अधिकतर गांवों के लोग गांव से पलायन कर भगवानपुर, चैनपुर प्रखंड सहित जिला मुख्यालय के सटे इधर-उधर गांव में जमीन खरीद कर अपना आवास बना लिये हैं. इसकी जमीनी हकीकत जानने के लिए प्रभात खबर संवाददाता ने अधौरा प्रखंड के कई गांवों का दौरा भी किया व वनवासियों का दर्द जाना, तो वनवासियों का कहना था कि जब चुनाव आता है तो सांसद व विधायक क्षेत्र का भ्रमण करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कभी-कभी प्रखंड मुख्यालय में आते हैं व केवल अपनी चेहरा दिखा कर चले जाते हैं. गांव के विकास पर ध्यान नहीं देते, जिसके चलते आज भी गांव की स्थिति जस की तस बनी है. न ही सड़क है, न ही बिजली है, न ही डिजिटल युग होने के बाद भी यहां नेटवर्क ही आता है. ग्रामीणों का कहना था कि गांव में विकास नहीं होने के कारण लोग पलायन कर दूसरे जगह या शहर मुख्यालय सहित अन्य जगहों पर अपना आशियाना बना लिये हैं, लेकिन हमारी दर्द सुनाने वाला अब भी कोई नहीं है. = आधा दर्जन गांवों में बाइक से भी नहीं पहुंच सकते अधौरा, चैनपुर व भगवानपुर प्रखंड के एक दर्जन से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां जून के महीने में वाहन तो दूर बाइक से भी गांव तक जाना मुश्किल है. अधौरा प्रखंड के कदहर, लौंदा, बांदा, कतररोड, मुडेरा, भगवानपुर के भूरकुंडा, चैनपुर प्रखंड के असंदाह, झरिया सहित कई गांव ऐसे हैं, जहां आज भी वाहन तो दूर मोटरसाइकिल भी गांव तक नहीं पहुंच सकते हैं. अब भी गांव के लोग को अगर बरसात में स्वास्थ्य खराब हो जाये, तो खाट के ही सहारे अस्पताल तक पहुंचाया जा सकता है. क्या कहते हैं ग्रामीण = कदहर कला निवासी रामायण सिंह खरवार ने कहा कि गांव में रहना मुश्किल हो गया है. वाहन गांव तक नहीं आने के कारण कोसों दूर पैदल चलना पड़ता है. चुनाव के दौरान भी कभी-कभी प्रत्याशी नहीं कार्यकर्ता पहुंचते हैं और झूठे वादे कर चले जाते हैं, स्थिति वही रह जाती है. = डूमरकाेन गांव निवासी चंद्रिका यादव ने कहा कि बरसात के दिनों में गांव से निकालना मुश्किल हो जाती है. जून के महीने में तो घर तक किसी तरह वाहन पहुंच जाता है, लेकिन बरसात के दिनों में मोटरसाइकिल से भी पहुंचना मुश्किल हो जाता है. कहा कि हाईटेक जमाने में भी यहां ना तो मोबाइल का नेटवर्क है, ना ही बिजली की सुविधा, जिसके कारण लोग पलायन कर रहे हैं. =सेमरा पंचायत के मुखिया परमानंद सिंह खरवार ने कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते स्थानीय सांसद व विधायक से गांव की मूलभूत सुविधा के लिए हम लोग मांग करते रहते हैं, लेकिन कोई सुनने पर तैयार नहीं है. मेरे द्वारा कई बार स्थानीय विधायक व मंत्री से लेकर जिला प्रशासन से भी मांग की गयी है कि सेंचुरी नियमावली में बदलाव किया जाये, ताकि हाईटेक जमाने में बनवासी भी अच्छे से जीवन यापन कर सकें. लेकिन, किसी द्वारा इस पर अभी तक विचार नहीं किया गया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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