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जिले के सभी मुखिया गये अनिश्चितकालीन हड़ताल पर

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जिले के सभी मुखिया गये अनिश्चितकालीन हड़ताल पर

मोहनिया सदर. मंगलवार से मुखिया महासंघ के आह्वान पर जिले के सभी मुखिया अनिश्चितकाल के लिए कलम बंद हड़ताल पर चले गये. इसकी जानकारी देते हुए मुखिया संघ के प्रखंड अध्यक्ष सह बेलौड़ी पंचायत के मुखिया मीर इमरान ने बताया कि बिहार मुखिया महासंघ लगातार मनरेगा के क्रियान्वयन में उत्पन्न हो रही व्यापक समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न स्तरों पर पत्राचार करता रहा है, लेकिन विभाग स्तर पर कोई सकारात्मक दिशा निर्देश नहीं दिया जा रहा था. इसके कारण बिहार मुखिया महासंघ के आह्वान पर हम सभी मुखिया मनरेगा से संबंधित अपनी विभिन्न मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन कलम बंद हड़ताल पर हैं. जब तक महासंघ की तरफ से कोई दिशा निर्देश नहीं मिलता है हम लोग कलम बंद हड़ताल जारी रखेंगे. इस दौरान जनता को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी. उन्होंने कहा कि मनरेगा के माध्यम से ग्राम पंचायत द्वारा मानव दिवस सृजन करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. राज्य स्तर पर बिहार मुखिया महासंघ द्वारा 11 सितंबर 2024 को आयोजित राज्य स्तरीय बैठक में विभिन्न मांगों पर विचार करने का अनुरोध सरकार स्तर से करने का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें यह मांग की गयी थी कि मनरेगा अंतर्गत संचालित योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति का दायरा 2008 से ही पांच लाख तक निर्धारित है, प्रशासनिक स्वीकृति का दायरा पंचायत स्तर पर 15 से 20 लाख रुपये बढ़ाया जाये. प्रशासनिक स्वीकृति का दायरा कम होने से योजनाओं को खंड-खंड कर प्रशासनिक मंजूरी दी जाती है, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन पर प्रतिकूल असर पड़ता है. मनरेगा में पंचायत स्तर योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए पंचायत लाॅगिन से ही जॉब कार्ड व योजनाओं को एंट्री, डिमांड, वेब लिस्ट, मैटेरियल लिस्ट आदि समस्त कार्य किये जाने का प्रावधान है, लेकिन पंचायत में लाॅगिन का उपयोग अनधिकृत रूप से कार्यक्रम पदाधिकारी द्वारा कराया जाता है. इसे लेकर पंचायत को कंप्यूटर डेस्कटॉप इत्यादि उपलब्ध कराया जाये, ताकि पंचायत का कार्य सुचारू रूप से कराया जा सके. मनरेगा की योजनाओं में मजदूरों के भुगतान, सामग्री का भुगतान पंचायत स्तर से करने का प्रावधान है. वर्ष 2012 तक मुखिया व पीआरएस आदि के माध्यम से भुगतान होता था, लेकिन विगत कुछ वर्षों से भुगतान कार्यक्रम पदाधिकारी व प्रखंड लेखापाल द्वारा किया जाता है, जो नियम संगत भी नहीं है, दोनों व्यक्ति संविदा कर्मी हैं. संविदा कर्मियों के माध्यम से भुगतान नियमानुकूल नहीं है, जबकि प्रशासनिक स्वीकृति पंचायत स्तर से दी जाती है तो फिर भुगतान प्रखंड स्तर से करने का कोई औचित्य नहीं है. भुगतान की प्रक्रिया पूर्व की तरह पंचायत से करायी जाये. मनरेगा में एसओआर दर का नये सिरे से निर्धारण किया जाये. मनरेगा में अनुमेय कार्यों के अतिरिक्त भौगोलिक स्थिति का अध्ययन कराकर उसके अनुसार योजनाओं को शामिल किया जाये. मनरेगा में तीन वर्ष पूर्व हल्की मशीनरी का प्रयोग करने की अनुमति थी जिसे बंद किया गया है, जबकि गांव की गलियों में पेवर ब्लॉक आदि कार्यों में हल्के मशीनों के प्रयोग की आवश्यकता होती है. कारण यह है कि अधिक दूरी से मिट्टी लाना पड़ता है व रोड निर्माण में रोलर आदि की भी आवश्यकता है, ताकि योजनाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके. गांव की गलियों में मिट्टी मिलना मुश्किल काम है, इसलिए अधिक दूरी से मिट्टी लाना पड़ता है. इसके कारण योजनाओं का क्रियान्वयन संभव नहीं होता है, इसलिए ट्राली, छोटा रोलर आदि हल्के मशीनों के प्रयोग की अनुमति दी जाये, ताकि मजदूर अधिक दूरी से मिट्टी काटेंगे तो वह मिट्टी हल्के मशीनों से ढोकर लाया जा सके. मनरेगा में मजदूरी दर बाजार भाव के अनुसार निर्धारित किया जाये. राज्य के कई जिलों में कड़ी मिट्टी उपलब्ध है, जिसके कारण सामान्यत: वहां के मजदूर निर्धारित घन फिट मिट्टी नहीं काट पाते हैं. मनरेगा में लेबर मद की राशि का समयानुसार भुगतान कराया जाये, जहां वर्तमान समय में तीन माह से अधिक समय पर मजदूरी का भुगतान किया जाता है. सामग्री मद का भी भुगतान नियमानुसार नहीं हो पता है, जिसके कारण योजनाओं के क्रियान्वयन पर प्रतिकूल असर पड़ता है. दोनों मदों की राशि को समय अनुसार उपलब्ध कराया जाये. मनरेगा में मजदूरों को काम नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान है, उसे सख्ती से लागू किया जाये. मजदूरों के लिए निर्धारित कार्य दिवस 100 दिन को बढ़ाकर 200 दिन किया जाये. पंचायत रोजगार सेवक, पंचायत तकनीकी सहायक, बीएफटी, लेखापाल, कार्यक्रम पदाधिकारी के वेतन की समीक्षा की जाये. पीआरएस आदि कर्मियों का मानदेय काफी कम है, जिसके कारण कार्यों के प्रति रुचि सकारात्मक नहीं रहता है. मनरेगा में कन्टीजेंसी मद का अधिकांश भाग बीआरडीएस सोसाइटी पटना द्वारा किया जाता है, जबकि समिति के संचालन के लिए राज्य सरकार द्वारा अनुदान दिये जाने का प्रावधान है. कन्टीजेंसी मद की छह प्रतिशत राशि का उपयोग पंचायत व प्रखंड स्तर पर ही किया जाये. पंचायत स्तर पर सामान्य प्रकार की योजनाओं में 20 योजना तक ही कार्य निर्धारित कर दिया गया है, जबकि पंचायत समिति की योजनाओं में यह सीमा नहीं है जिसके कारण ग्राम पंचायतें राज्यसभा के निर्णय का अनुपालन नहीं कर पाती हैं. ग्राम पंचायत के लिए 20 योजनाओं तक के प्रबंध की सीमा को हटाया जाये.

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