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Home बिहार जमुई सनातन धर्म को प्रचार-प्रसार की नहीं, जानने की जरूरत है: महामंडलेश्वर उमाकांतानंद

सनातन धर्म को प्रचार-प्रसार की नहीं, जानने की जरूरत है: महामंडलेश्वर उमाकांतानंद

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सनातन धर्म को प्रचार-प्रसार की नहीं, जानने की जरूरत है: महामंडलेश्वर उमाकांतानंद

जमुई. सनातन धर्म को प्रचार-प्रसार की कोई जरूरत नहीं है, इसे बस जानने की जरूरत है. उक्त बातें जूना अखाड़ा हरिद्वार के महामंडलेश्वर डॉ उमाकांतानंद सरस्वती ने शुक्रवार को मुख्यालय स्थित स्वामी निरंजनानंद योग केंद्र में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा. उन्होंने कहा कि सनातन धर्म शाश्वत है, यह प्रकृति की देन है, लाखों बरसों से यह चल रहा है, इसलिए इसे प्रचार-प्रसार की कोई जरूरत नहीं है. साइंस्टिस आइंस्टीन का जन्म व उनकी खोज हम बता सकते हैं, न्यूटन की खोज बता सकते हैं पर विज्ञान कब से चल रहा है यह नहीं बताया जा सकता है. इसी तरह सनातन धर्म सृष्टि के साथ शुरू होता है इसका कोई आदि अंत नहीं है. इसलिए इसे केवल जानने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि लाखों ऋषि मुनियों की परंपरा से सनातन धर्म का विस्तार हआ है. इसमें अनेक संप्रदाय है, जिसका सनातन धर्म कभी विरोध नहीं करता है. इसमें जैन और बौद्ध भी हुए हैं, पर सनातन धर्म ने कभी विरोध नहीं किया. उन्होंने विषय परिवर्तन करते हुए कहा कि लोग पूजा पाठ में बरसों लगा देते हैं पर कोई फल नहीं मिलता. यह बिल्कुल वैसा है जैसे एक आदमी कहता है कि वह बहुत तेज चल रहा है, लेकिन इस पेड़ के नीचे बरसों से पड़ा है, जहां उसने शुरुआत की. जब उसे गौर से देखा जाता है तो पता चलता है वह एक ही जगह कूद रहा है. पूजा पाठ में आपको उपासना, साधना और आराधना करने की जरूरत होती हैं. यह सभी शब्द सुनने में सामान लगते हैं पर इनके अर्थ अलग हैं. जैसे डॉक्टरी की पढ़ाई के अलग कॉलेज होता है, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए अलग कॉलेज होता है, मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए अलग कॉलेज होता है. इसी प्रकार पूजा-पाठ करना चाहिए और आपकी क्या इच्छा है उसके अनुरूप उपासना करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि उपसना का मतलब है नजदीक बैठना, तो किसके नजदीक बैठा जाये, स्वाभाविक है कि ईश्वर के नजदीक बैठ जाये. जैसे चोर की संगति में चोरी और साधु की संगति में भलाई के काम होते हैं उसी प्रकार उपासना में संगति का असर होता है. उन्होंने कहा कि दूसरा कदम है साधना, तो साधेंगे किसे ईश्वर को, जिसने इस सृष्टि को बनाया है. अपनी इंद्रियों और वासनाओं को नियंत्रित करना है, यही साधना होती है. फिर होती है आराधना इसमें दीन-दुखियों की सेवा की जाती है. श्रीकृष्ण ने कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी में व्याप्त मुझ को छोड़कर जो मेरी प्रतिमा को पूछता है, उसे मैं नहीं मिलता. इसलिए दीन दुखियों तथा आम लोगों की सेवा करनी चाहिए जिससे फल की प्राप्ति होती है.

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