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नमाज अदा कर मांगी अमन-चैन के दुआ

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नमाज अदा कर मांगी अमन-चैन के दुआ

जमुई. जिले भर में शब-ए-बारात का पर्व अकीदत और एहतराम के साथ मनाया गया. सुबह से ही मुस्लिम समाज के लोग इसकी तैयारियों में जुटे रहे. मंगलवार की शाम होते ही लोग मस्जिदों की ओर रुख करने लगे, जहां नमाज़ और इबादत का सिलसिला देर रात तक चलता रहा. कई लोगों ने मस्जिदों में जाकर सामूहिक रूप से इबादत की, जबकि अनेक लोगों ने अपने घरों में ही कुरआन की तिलावत और नफ्ल नमाज़ अदा की. शब-ए-बारात की रात मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने गुनाहों की माफी के लिए अल्लाह से दुआ मांगी तथा देश में अमन-चैन और खुशहाली की कामना की. मौलाना फारूक अशरफी ने बताया कि इस्लाम धर्म में शब-ए-बारात का विशेष महत्व है यह इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की 15वीं तारीख को मनाई जाती है. उन्होंने कहा कि शब-ए-बारात शाबान की 14वीं और 15वीं तारीख के दरमियान की रात होती है, जिसमें मुसलमान पूरी रात जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं, कुरआन पढ़ते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं. मौलाना फारूक अशरफी ने कहा कि इस रात अपने परिवार, रिश्तेदारों, मुल्क और पूरी दुनिया की सलामती के लिए दुआ की जाती है. शब-ए-बारात की रात दुआओं का खास महत्व होता है, इसलिए इसे इबादत, फज़ीलत, रहमत और मग़फिरत की रात कहा जाता है. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार इस रात की गई हर जायज दुआ अल्लाह कबूल करते हैं और अपने बंदों के गुनाहों को माफ करते हैं.

गुनाहों से तौबा की अहम रात

शब-ए-बारात इस्लाम की महत्वपूर्ण रातों में से एक है इस रात मुसलमान न केवल इबादत करते हैं, बल्कि अपने गुनाहों से तौबा भी करते हैं. साथ ही अपने पूर्वजों और मरहूम लोगों की मग़फिरत के लिए दुआ करते हैं. कई लोग इस मौके पर कब्रिस्तान जाकर फातिहा भी पढ़ते हैं.

इस्लाम की अहम रातों में शामिल है शब-ए-बारात

इस्लाम में कुल पांच रातों को विशेष महत्व दिया गया है. मान्यता है कि इन रातों में अल्लाह अपने बंदों की जायज दुआओं को कबूल करते हैं. ये रातें हैं शब-ए-बारात, ईद की रात, बकरीद की रात, मेराज की रात और रमजान की शब-ए-कद्र. इन रातों में अल्लाह की रहमत बरसती है.

रोजा रखने की भी परंपरा

शब-ए-बारात के अवसर पर दो दिनों का रोजा रखने की परंपरा भी है. पहला रोजा शब-ए-बारात के दिन और दूसरा अगले दिन रखा जाता है. यह रोजा फर्ज नहीं बल्कि नफ्ल होता है, जिसे लोग अपनी आस्था के अनुसार रखते हैं. मान्यता है कि इस दिन रोजा रखने से बीते साल में जाने-अनजाने में हुए गुनाहों की माफी मिलती है.

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