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Home बिहार जमुई सदैव अपने कर्म व संघर्ष पर विश्वास रखते थे नरेंद्र सिंह

सदैव अपने कर्म व संघर्ष पर विश्वास रखते थे नरेंद्र सिंह

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सदैव अपने कर्म व संघर्ष पर विश्वास रखते थे नरेंद्र सिंह

खैरा. बिहार सरकार के पूर्व मंत्री दिवंगत नरेंद्र सिंह की दूसरी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. इसे लेकर उनके पैतृक गांव पकरी के समीप किउल नदी के तट पर स्थित समाधि स्थल पर सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई और श्रद्धांजलि दी गयी. उनके पुत्र पूर्व विधायक अजय प्रताप, बिहार सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री सुमित कुमार सिंह, पुत्र अमित कुमार सिंह, भाई चंद्रशेखर सिंह, पौत्र अर्जुन वीर, धर्मपत्नी सागर मणी, बहु भारती सिंह, मीनाक्षी सिंह, सपना सिंह समेत परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके स्मारक स्थल पर पुष्प अर्पित किया. इस दौरान कई विधायक व प्रबुद्ध जनों ने भी उन्हें पुष्प अर्पित किया. पूर्व विधायक अजय प्रताप ने कहा कि नरेंद्र बाबू मेरे पूज्य पिता थे और राजनीतिक गुरु भी थे. वे कर्मयोगी थे, सदैव अपने कर्म व संघर्ष पर विश्वास रखते थे. मंत्री सुमित कुमार सिंह ने कहा कि अचानक पिता के चले जाने का काफी सदमा है. मैं अपनी कर्म भूमि, जन्म भूमि व समस्त बिहार के विकास को लेकर जीवन पर्यंत संघर्ष करता रहूंगा. मौके पर झाझा विधायक दामोदर रावत, सिकंदरा विधायक प्रफुल्ल मांझी, जदयू जिलाध्यक्ष शैलेंद्र महतो, भाजपा जिलाध्यक्ष कन्हैया सिंह, राजद जिलाध्यक्ष त्रिवेणी यादव, लोजपा जिलाध्यक्ष जीवन सिंह, जेपी सेनानी राजेश सिंह, जदयू नेता ई शंभू शरण, पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष ब्रह्मदेव रावत, शिवशंकर चौधरी, राजीव रंजन पांडेय, पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष नवल सिंह, लोजपा नेता रूबेन कुमार सिंह, प्रभु राम, जमादार सिंह, चंद्रशेखर सिंह, भाजपा नेता निर्मल कुमार सिंह समेत बड़ी संख्या में लोगों ने पूर्व मंत्री को श्रद्धांजलि दी.

1973 से शुरू हुआ था राजनीतिक सफर, 1985 में पहली बार बने विधायक

नरेंद्र सिंह का राजनीतिक सफर एक छात्र नेता के तौर पर शुरू हुआ था. 1973 में पहली बार पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव चुने गये थे. तब रामजतन शर्मा अध्यक्ष थे. दूसरी बार 1974 में लालू प्रसाद अध्यक्ष और नरेंद्र सिंह महासचिव निर्वाचित हुए. पहली बार 1985 में चकाई विधानसभा से विधायक चुने गये थे. तब उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उन्हें 53338 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के स्व फाल्गुनी यादव को 20210 मत प्राप्त हुए थे. उन्होंने इस चुनाव में फाल्गुनी यादव को 33128 मतों से पराजित किया था. 1990 में वे दूसरी बार पुनः चकाई से निर्वाचित हुए. इस बार उन्होंने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उन्हें 48326 मत प्राप्त हुए थे. इस चुनाव में स्व सिंह ने भाजपा के फाल्गुनी यादव को 17131 मतों से पटखनी दी थी. इसी सरकार में पहली बार उन्हें मंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ. हालांकि बगावती तेवर के कारण वे बहुत ज्यादा दिनों तक मंत्रिमंडल में नहीं टिक सके और त्यागपत्र देकर लालू सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था. 2000 के विधानसभा चुनाव में वे एक साथ दो विधानसभा क्षेत्र जमुई और चकाई से विधायक चुने गये. जमुई से उन्होंने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उन्हें 44656 वोट मिले थे. निकटतम प्रतिद्वंद्वी उमाशंकर भगत को 38277 मत प्राप्त हुए थे. वहीं चकाई विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले नरेंद्र सिंह को वहां भी भारी जनसमर्थन प्राप्त हुआ था. उस चुनाव में नरेंद्र सिंह को 58345 वोट मिले थे, जबकि फाल्गुनी यादव को 27874 वोट प्राप्त हुए थे. बाद में उन्होंने जमुई से इस्तीफा देकर सुशील कुमार सिंह उर्फ हीरा जी को विधायक बनाने में महती भूमिका निभाई थी. 2005 में नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बने और 2015 में जीतन राम मांझी सरकार चलने तक वह इसपर आसीन रहे.

नरेंद्र सिंह ने अपना कार्य क्षेत्र के रूप में चकाई विधानसभा का किया था चयन

नरेंद्र सिंह ने अपना कार्य क्षेत्र के रूप में चकाई विधानसभा को चुना था और शुरुआत से ही वे लगातार चकाई विधानसभा में चुनाव लड़ते रहे थे. पहली बार उन्होंने 1977 में विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस दौरान उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था. दरअसल उस साल उनके पिता श्री कृष्ण सिंह ने झाझा विधानसभा से चुनाव लड़ा था और कार्यकर्ताओं के दो जगह बंट जाने के कारण सही तरीके से चुनाव प्रचार नहीं हो पाया था. नरेंद्र सिंह ने इस चीज को देखा समझा और चुनाव के लिए अलग रणनीति बनायी. इसके बाद वे लगातार चकाई विधानसभा में चुनाव लड़ते रहे. प्रचार के लिए वह महीनों पैदल ही गांव-गांव घूमते थे और अपने लोगों के साथ प्रचार किया करते थे.

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