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Home बिहार जमुई जहां कभी बिखरी रहती शवों की राख, आज वहां बिछी है हरियाली की चादर

जहां कभी बिखरी रहती शवों की राख, आज वहां बिछी है हरियाली की चादर

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जहां कभी बिखरी रहती शवों की राख, आज वहां बिछी है हरियाली की चादर

बरहट. वह भूमि जो कभी बंजर थी और श्मशान बन चुकी थी. वहां सिर्फ जलते शवाें की आग व धुआं ही दिखायी देते थे, लेकिन आज उसी भूमि पर हरियाली की चादर बिछी है. ऐसा संभव हो पाया है एक किसान के अथक प्रयास व उनके द्वारा अपनायी गयी प्राकृतिक पद्धति जैविक खेती से. प्रखंड अंतर्गत कटौना क्षेत्र के योगेंद्र पंडित की लगभग पांच एकड़ की पैतृक भूमि बंजर होने के कारण श्मशान के रूप में उपयोग में लाया जाता था. लेकिन बीते एक दशक से योगेंद्र ने बिना किसी रासायनिक खाद व कीटनाशक के उपयोग से जैविक खेती करके यह साबित कर दिया है कि संकल्प और वैज्ञानिक सोच से बंजर जमीन को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है. उन्होंने करीब पांच एकड़ बंजर भूमि को खेती योग्य बनाकर एक नयी मिसाल पेश की है. लगातार मेहनत और धैर्य के साथ उन्होंने इस जमीन की उर्वरता बढ़ायी, जिसका परिणाम आज हरियाली और भरपूर फसल के रूप में सामने है.

150 से अधिक औषधीय पौधों की खेती

किसान योगेंद्र पंडित के खेतों में आलू, गेहूं, चावल जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ लगभग 150 प्रकार के औषधीय पौधे सामबली ,बीधारा ,गुड़मार, बालमखीरा ,बांसा ,आमला ,बहिरा, हर्रे, पारस पीपल भी लगाए गये हैं. इसके अलावा काला आलू ,कुफरी लीलकंठ,कुफरी संगम ,लाल गुलाब इन फसलों से वे घरेलू और आयुर्वेदिक दवाइयां तैयार करते हैं. जिससे लोगों को परमहंस एवं वैष्णवी देवी मां आश्रम में प्राकृतिक इलाज कर जैविक खेती के प्रति जागरूक भी करते हैं.

पर्यावरण संरक्षण व समाज सेवा का उद्देश्य

किसान योगेंद्र पंडित का कहना है कि उनका मुख्य लक्ष्य पर्यावरण की रक्षा करना और समाज को रोगमुक्त बनाना है. वे मानते हैं कि रासायनिक खेती से उत्पादन तो बढ़ा लेकिन बीमारियां भी तेजी से बढ़ीं. इसी सोच के साथ उन्होंने जैविक और औषधीय खेती को अपना मिशन बना लिया.

पिता की शिक्षा बनी प्रेरणा

इस पहल के पीछे उनके पिता की भूमिका भी अहम रही है. योगेंद्र पंडित बताते हैं कि उनके पिता ने 90 के दशक में विज्ञान विषय से बीएससी की पढ़ाई की थी.जिसका व्यावहारिक ज्ञान आज खेती में उपयोग हो रहा है. वैज्ञानिक पद्धति से मिट्टी सुधार, जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों का प्रयोग कर जमीन की गुणवत्ता बढ़ायी गयी.

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