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Home बिहार जमुई लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिलाओं को मिले मौका तभी सुरक्षित व सबल हो सकेंगी महिलाएं

लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिलाओं को मिले मौका तभी सुरक्षित व सबल हो सकेंगी महिलाएं

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जमुई : कहने को तो महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है पर जब राजनीतिक दल की बात आती है तब उनकी भागीदारी उदासीन हो जाती है. समाज में महिलाएं हर मोर्चे पर अपनी जवाबदेही जिम्मेदारी के साथ निभा रही है पर राजनीति के परिपेक्ष्य में उनकी भागीदारी को सही दशा और दिशा नहीं मिल सकी है.
उक्त बातें अंतरराट्रीय महिला दिवस को लेकर प्रभात खबर के द्वारा आयोजित परिचर्चा के दौरान जिले की कामकाजी राजनीतिक दलों तथा घरेलू महिलाओं ने कहा महिलाओं ने कहा कि अपनी जवाबदेही का निर्वहन बड़ी जिम्मेदारी के साथ कर रही हैं पर राजनीतिक दलों में उनकी भागीदारी की बात जहां तक आती है हर राजनीतिक दल लीपापोती कर उन्हें रेस से बाहर कर देते हैं.
महिलाओं को राजनीतिक दलों में मिले 33 प्रतिशत आरक्षण
महिलाओं ने यह मांग की कि आने वाले लोकसभा चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण की तर्ज पर महिलाओं को भी सभी राजनीतिक दलों में 33 प्रतिशत भागीदारी देते हुए उन्हें प्रत्याशी बनाना होगा. जिसके बाद महिलाएं भी बड़ी संख्या में चुनकर सदन में अपने आप को प्रखरता से प्रस्तुत कर सकेंगे.
जिसके बाद महिलाओं की सुरक्षा सही मायनों में तय होगी महिलाओं ने कहा कि इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को पीछे धकेल दिया जाता है और अगर कोई महिला समाज और इसके दकियानूसी विचारधारा से लड़कर आगे आने का प्रयास भी करती है, तब उन्हें नीचा दिखाया जाता है तथा उन पर संगीन आरोप लगाकर उन्हें बाहर कर दिया जाता है.
इसके अलावा उन्होंने कहा कि जब कभी किसी पुरुष को राजनीति में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती है तब महिलाओं का चेहरा तो वह इस्तेमाल करते हैं पर महिला को शक्ति प्रदान नहीं करते महिलाओं ने कहा कि महिला सहनशील होती है और वह घर का काम बड़ी खूबसूरती के साथ निर्वहन कर लेती है.
ऐसे में अगर उन्हें राजनीतिक जवाबदेही भी जाये तो वह शत प्रतिशत अपनी जिम्मेदारी का निर्वह्न कर पायेंगे. महिलाएं राजनीतिक दलों में भूमिका निभा रही है. वह अपनी हर जवाबदेही जिम्मेदारी के साथ पूरा कर रही है. बावजूद इसके देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के बारे में सोचने का काम नहीं कर रही हैं. उन पार्टियों को महिलाओं के बारे में सोचना होगा. नमिता देवी,जमुई.
कहने को तो महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण मिला है पर वास्तविकता यह है कि महिलाओं को 15 फीसद आरक्षण का भी लाभ नहीं मिल रहा है. महिला प्रत्याशी के बगैर हम सुरक्षित नहीं है. जब किसी बेटी बहन के साथ बुरा होता है. तब पुरुष प्रत्याशी उसके हक में खड़े तक नहीं होते हैं. इसलिए अबे सकता है कि राजनीतिक दलों में महिलाओं को मौका मिले.
साधना सिंह, अधिवक्ता
महिलाएं लोकतंत्र को बना सकती हैं मजबूत
महिलाएं लोकतंत्र को मजबूत बना सकती हैं. क्योंकि वह कोई भी काम शत-प्रतिशत करने की चाह और उसका जज्बा रखती है. ऐसे में राजनीतिक दलों को अब आगे आकर या निर्णय लेना होगा कि महिलाओं को भी 33 फीसदी भागीदारी देनी होगी.
सुमन ठाकुर, शिक्षिका.
जब कहीं कोई पुरुष प्रत्याशी अपनी हार नहीं बचा पाता है. तब वहां महिलाओं को चेहरा बनाकर इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद उन्हें पीछे धकेल दिया जाता है. जबकि जरूरत है कि महिलाओं को मौका दिया जाए उन्हें उन का अधिकार दिया जाये. उन्हें आजादी दी जाये.
प्रेमलता, शिक्षिका
इस देश में जब भी जरूरत पड़ी है. महिलाओं ने खुद को साबित किया है. चाहे वह सरोजिनी नायडू इंदिरा गांधी हो या कल्पना चावला आज महिलाएं किचन से लेकर अंत तक है पर राजनीतिक दल से नहीं मानते जो काफी गलत है. महिलाओं को 33 प्रतिशत या 50 प्रतिशत भागीदारी देनी होगी और जरूरत है. महिलाओं को भी अपनी लड़ाई मर्यादित तरीके से लड़नी होगी.
विभा कुमारी, अधिवक्ता
महिलाओं को िटकट देने में करते हैं आनकानी
महिलाओं को राजनीतिक दलों में इस्तेमाल किया जाता है. उनसे पार्टी का काम लिया जाता है पर उन्हें जब प्रत्याशी बनाने की बात आती है. तब पार्टियां इस पर लीपापोती कर आगे बढ़ जाती हैं. इस विचारधारा को बदलना होगा.
तारा देवी, सदस्य
महिलाएं जिस तरीके से अपने परिवार को सशक्त बनाती है. अगर उन्हें राजनीति में मौका दिया जाए तो वह अपने समाज को भी सशक्त बना सकते हैं. महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी तो मिले ही मिले इसके अलावा जिस तरीके से आज आधी आबादी महिलाओं की है उन्हें भी आधी आबादी के तौर पर लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया जाये.
नीलम कुमारी, शिक्षिका
आज देश के सबसे बड़े सदन लोकसभा में महज 64 महिला सदस्य हैं तथा राज्य सभा में महज 28 सदस्य हैं, जो यह दिखाता है कि महिलाओं की राजनीति में किस तरीके से भागीदारी को राजनीतिक दल अहमियत नहीं दे रहे हैं. महिला को बढ़-चढ़कर दिखाया तो जाता है पर उन्हें पुरुषों के पीछे धकेल दिया जाता है.
सुजाता सिन्हा, शिक्षिका.
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