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Gopalganj News : ब्रह्मलीन हुए स्वामी स्वरूपानंद

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Gopalganj News : ब्रह्मलीन हुए स्वामी स्वरूपानंद

शोभायात्रा निकाल कर दी गयी समाधि

बरौली. प्रेमनगर आश्रम के अध्यक्ष व संचालक स्वामी स्वरूपानंदजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये. शुक्रवार की देर रात 10:43 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली. स्वामीजी के स्वर्गवासी होने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे प्रखंड में फैल गयी और रात से ही शिष्यों का पहुंचना शुरू हो गया. उनके तथा उनके गुरु ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानंदजी परमहंस के शिष्य न केवल पूरे भारत में बल्कि विश्व के कोने-कोने में फैले हुए हैं बल्कि अन्य प्रदेश से आने वाले शिष्यों को भी अंतिम दर्शन हो सके इसलिए शव को अगले दिन शोभायात्रा निकालने के बाद आश्रम परिसर में रखा गया था. आश्रम के महंत स्वामी निजानंद महाराज ने बताया कि स्वामीजी की उम्र करीब 80 वर्ष थी. शरीर की कमजोरी के कारण वे असहज तो थे, लेकिन कोई बड़ी बीमारी उनको नहीं थी. रोजाना सुबह स्नान-ध्यान और पूजा-पाठ के बाद भक्तों के साथ बैठकर उनको जीवन के गुढ़ रहस्यों से परिचय कराना तथा संसार के भवसागर से पार होने का रास्ता बताना उनकी दिनचर्या में शामिल था. चूंकि स्वामीजी को चलने-फिरने में परेशानी थी, इसलिए उनकी सेवा-सुश्रुषा की पूरी जिम्मेदारी महंत निजानंद की ही थी. दिन के करीब 12 बजे स्वामीजी की अंतिम शोभायात्रा निकली जिसमें स्वामीजी के शरीर को सजा-संवार कर रथ पर विराजमान कराया गया था,वहीं सैकड़ों भक्त तथा शहर के भक्त नर-नारी उनकी शोभायात्रा में शामिल हुए थे. यात्रा में भड़कुइयां रामजानकी धाम के महंत रितेश दास, राधाकिशुन चौधरी, योगेन्द्र उपाध्याय, वीरेंद्र सिंह, मदन सिंह, शिवेंद्र सिंह, अक्षयलाल सोनी, सिंटू सोनी, निहाल उपाध्याय सहित कई प्रदेशों से पहुंचे शिष्य शामिल थे. शहर के लोगों का कहना था कि स्वामीजी के ब्रह्मलीन होने से सनातन का एक स्तंभ ढह गया है.

दूसरों को बनाया महंत, स्वयं करते रहे थे आश्रम की देखभाल

स्वामी स्वरूपानंद आश्रम के संस्थापक स्वामी आत्मानंद परमहंस के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक थे. आत्मानंदजी जब ब्रह्मलीन हुए तो आश्रम की सारी जिम्मेदारी स्वरूपानंद पर आ गयी, शिष्यों ने उनको महंत बनने की गुजारिश की, लेकिन उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की तथा अपने एक शिष्य नित्यानंदजी को महंत बनाया तथा नित्यानंदजी जब गोलोकवासी हुए तो पुन: लोगों ने उनसे महंत बनने का आग्रह किया, लेकिन इस बार भी उन्होंने स्वामी निजानंदन को महंत बनाया. शुरू से हीं उनकी प्रवृत्ति एक त्यागी संत की रही जिस पर वे अंतिम समय तक डटे रहे. स्वरूपानंदजी की समाधि आत्मानंदजी की समाधि के ठीक पीछे आश्रम में ही बनायी गयी. स्वामीजी को जब समाधि दी जा रही थी तो सैकड़ों शिष्यों की आंखें भर आयीं और सबने सजल नेत्रों से अपने गुरु को अंतिम विदाई दी.

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