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हेमाद्रि स्नान के साथ कल मनेगा श्रावणी उपाकर्म

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हेमाद्रि स्नान के साथ कल मनेगा श्रावणी उपाकर्म

गोपालगंज. सावन पूर्णिमा 19 अगस्त को है. इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी है. श्रावण पूर्णिमा पर स्नान, दान, पूजा, पितरों का तर्पण करने के अलावा श्रावणी उपाकर्म का भी विशेष महत्व है. श्रावणी उपाकर्म की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. इस दिन नया जनेऊ धारण करने का भी विधान है. अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा की ओर से व्यापक तैयारी की जा रही है. कुचायकोट प्रखंड के जलालपुर स्थित भट्ठा पर स्थित ऐतिहासिक सरोवर में उपाकर्म का आयोजन होना है. ब्राह्मण महासभा अपने संस्कृति को संरक्षित करने के लिए लगातार कोशिश में जुटा है. इसके साथ ही भोरे व कटेया में भी श्रावणी उपाकर्म की तैयारी चल रही है.

जाने-आनजाने हुए पाप कर्मों का होता है प्रायश्चित

अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के जिलाध्यक्ष पं राजेंद्र पांडेय ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म के तीन पहलू हैं, प्रायश्चित संकल्प, अनुष्ठान और स्वाध्याय. तीन पक्ष हैं. इनमें प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय शामिल हैं. इसमें प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प होता है. गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही-घी के साथ ही गोबर व गोमूत्र और पवित्र कुशा से स्नान कर साल भर में जाने-आनजाने हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित करता है. जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से भरता है. स्नान विधान के बाद ऋषि पूजा, सूर्योपस्थान व यज्ञोपवीत पूजन कर उसे धारण किया जाता है. यह आत्म संयम का संस्कार है. इस संस्कार से व्यक्ति का पुनर्जन्म माना जाता है. सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, सदसस्पति, अनुमति, छंद व ऋषि को घृत से आहुति से स्वाध्याय की शुरुआत होती है. इसके बाद वेद-वेदांग का अध्ययन किया जाता है.

श्रावणी उपाकर्म के महत्व को भी समझिए

ब्राह्मण महासभा के प्रवक्ता पं मंजीत त्रिपाठी ने बताया कि 16 संस्कार होते हैं. इनमें जनेऊ या यज्ञोपवीत संस्कार भी एक जनेऊ पहनने से स्मरण शक्ति बढ़ती है. जनेऊ को सत, रज, तम का प्रतीक माना जाता है. इसके तीन धागे त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतीक भी माने जाते हैं. इसे पहनने से व्यक्ति को इन सभी का आशीर्वाद प्राप्त होता है. माना जाता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी शक्तियां नहीं आती हैं. सावन पूर्णिमा पर श्रावणी उपाकर्म का महत्व सावन पूर्णिमा पर जनेऊ पहनना भी श्रावणी उपाकर्म का ही एक अंग है. श्रावणी उपाकर्म में पितरों को 10 प्रकार से स्नान कराकर जल दिया जाता है और साथ ही आत्म कल्याण के लिए मंत्रों के साथ यज्ञ में आहुतियां दी जाती हैं.

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