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कम आयु में विवाह से समाप्त हो जाते हैं आत्मनिर्भरता के अवसर

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कम आयु में विवाह से समाप्त हो जाते हैं आत्मनिर्भरता के अवसर

सीयूएसबी के लीगल एड क्लिनिक ने 100 दिनी जागरूकता कार्यक्रम का शुभारंभ

वरीय संवाददाता, गया जी.

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस के अंतर्गत संचालित लीगल एड क्लिनिक की ओर से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) गया जी के सहयोग से बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत 100 दिवसीय गहन जागरूकता कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया. एनएएलएसए व आशा की पहल के तहत संचालित कार्यक्रम का उद्देश्य बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा के विरुद्ध जन जागरूकता फैलाना तथा बच्चों के कानूनी अधिकारों को सशक्त बनाना है.

पीआरओ मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि प्रथम दिन छात्रों की टीम द्वारा लीगल एड क्लिनिक के समन्वयक डॉ सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में उच्च माध्यमिक विद्यालय टेपा फतेहपुर विद्यालय में विधिक जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिसमें निबंध लेखन प्रतियोगिता व सार्थक परिचर्चा प्रमुख रूप से सम्मिलित रही. निबंध लेखन प्रतियोगिता का विषय मेरा बचपन, मेरा अधिकार रखा गया. प्रतियोगिता में विद्यालय के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. बाल विवाह के दुष्परिणामों, शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव तथा सुरक्षित व सम्मानजनक बचपन के अधिकार पर अपने विचार सशक्त रूप से प्रस्तुत किये.

स्कूल ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस के डीन एवं प्रमुख प्रो अशोक कुमार के मार्गदर्शन में लीगल एड क्लिनिक के समन्वयक डॉ सुरेंद्र कुमार द्वारा विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गयी, जिसमें फतेहपुर विद्यालय की प्रधानाचार्या सुमिता कुमारी तथा विद्यालय के शिक्षक आशुतोष कुमार, ममता कुमारी, उषा कुमारी, संगीता चौधरी, राधा कुमारी, धीरज कुमार, नासिरउद्दीन व सत्यम कुमार ने बाल विवाह उन्मूलन, बच्चों के कानूनी अधिकारों एवं समाज की भूमिका पर अपने विचार रखे.

इनकी रही सक्रिय सहभागिता

कार्यक्रम के सफल आयोजन में विश्वविद्यालय के प्राध्यापक मणि प्रताप, डॉ अनंत प्रकाश नारायण, डॉ चंदना सुबा की महत्वपूर्ण भूमिका रही. विश्वविद्यालय के छात्र तनीषा, रिफत, पुष्पित, अनुज, छवि, रामपुकार, आदिशा, ऋतुपर्णा, सौम्या, साध्वी, आलोक, सनी, इरफान, दिप्ता व अन्य छात्रों की सक्रिय सहभागिता एवं समर्पण उल्लेखनीय रहा. परिचर्चा के दौरान यह निष्कर्ष निकला कि बाल विवाह के समाज में अनेक गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं, जो बालक-बालिकाओं के शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक एवं सामाजिक विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं.

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