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Darbhanga News: किसानों के लिए परेशानी का सबब बना धान का पुआल

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Darbhanga News: किसानों के लिए परेशानी का सबब बना धान का पुआल

Darbhanga News: जाले. किसानों के लिए धान का पुआल गले की हड्डी की तरह अटका हुआ है. कृषि विभाग ने वातावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए खेतों में पुआल जलाने पर किसान रजिस्ट्रेशन तीन वर्षों के लिए कैंसिल करने का फरमान जारी कर रखा है. विभागीय अधिकारी का कहना है कि पुआल जलाने से हवा में कालिखयुक्त धुआं निकलता है, जो वायु की गुणवत्ता को खराब करता है. कटनी के बाद धान की फसल अवशेष को जलाने पर आसपास के खेतों, खलिहानों व आबादी वाले क्षेत्रों में भी आग लगने की आशंका बनी रहती है.

इधर खेतों से पुआल हटाने में लगने वाले खर्च भी नहीं निकलते देख बड़ी संख्या में किसान पुआल के ढेर में आग लगाने के लिए विवश हैं. किसानों का कहना है कि रबी बोआई का भी समय बीत रहा है. ऐसे में किसान पुआल जलाने के लिए मजबूर हैं. उनका कहना है कि इस वर्ष धान का पुआल इतना अनुपयोगी हो गया है कि उसे मवेशी भी नहीं खा रहे. पूर्व में गरीब-गुरबा ठंड से बचने के लिए पुआल का बिछावन में भी उपयोग करते थे. वर्तमान में उसे कोई पूछने वाला नहीं है. नाम व गांव का नाम नहीं छापने की शर्त्त पर एक किसान ने बताया कि बढ़ती जनसंख्या के कारण पूर्व की व्यवस्था चरमरा गयी है. पहले धान काटकर किसान अपने खेतों से धान का बोझा बैलगाड़ियों, ट्रैक्टर-ट्राली अथवा मजदूरों से ढोकर खलिहान में लाते थे. खलिहान के एक किनारे उन बोझाओं को इकठ्ठा कर छोड़ दिया जाता था. किसान रबी फसलों की बोआई सम्पन्न करने के बाद ही खलिहान में बोझा को छोटा बनाकर बेंच अथवा ड्राम पर झाड़ते थे. उन छोटे-छोटे पुआल के बोझा को व्यापारी खरीदकर उसका कुट्टी काटकर शहरों के पशुपालकों के बीच बिक्री कर देते थे. गेहूं का भूसा नहीं मिलने पर शहरों के पशुपालक पुआल की कुट्टी खिलाना पसंद करते हैं. वह पुआल काफी मुलायम होता था और उसे मवेशी खूब चाव से खाते थे. इसके अलावा गरीब-गुरबा बिछावन में रखने के लिए भी पुआल ले जाते थे. अब तो खलिहान नहीं रहने के कारण खेत ही खलिहान बन गया है. थ्रेसिंग के बाद किसान खेतों से धान तो उठा लाते हैं, परंतु पुआल के ढेर वहीं एक छोड़ पर रह जाता है. रबी की फसल प्रभावित होते देख किसान पुआलों को खेतों में जलाने के लिए मजबूर हैं.

बिना जलाये पुआल को खेत की ताकत में बदल सकते किसान

पुआल एक कृषि अपशिष्ट है. इसे खेतों में फैलाकर बायो-डीकम्पोजर से उपचारित करने पर यह तेजी से खाद बन जाता है. किसान चाहें तो बिना जलाए इस पुआल को खेत की ताकत में बदल सकते हैं. मल्चर की मदद से पुआल को बारीक काटकर खेत में मिलाया जाता है. इसके उपरांत हैप्पी सीडर या सुपर सीडर मशीन पुआल को मिट्टी में दबाकर सीधी बोआई की जा सकती है. इससे डीजल की खपत कम होती है. समय बचता है. मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है. पुआल को मिट्टी में मिलाकर या अन्य तरीकों से उसका अपघटन कर जैविक खाद बनाया जा सकता है. इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है. पुआल में उपस्थित नाइट्रोजन की लगभग सारी मात्रा, फॉस्फोरस का लगभग 25 प्रतिशत मात्रा, पोटेशियम का 20 प्रतिशत और सल्फर का पांच से 50 प्रतिशत होते हैं, जो खेत के मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाता है. पुआल को खेत में निस्तारित करने से मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है और मिट्टी की जल धारण क्षमता में भी इजाफा होता है.

– डॉ दिव्यांशु शेखर, अध्यक्ष केवीके, जाले

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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