दरभंगा के जाले से केशवेन्द्र प्रताप ठाकुर की रिपोर्ट
Darbhanga Agriculture News: जाले प्रखंड क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण किसान निजी नलकूपों के सहारे धान की रोपनी में जुटे हैं. बिजली की अनियमित आपूर्ति के बावजूद किसान पूरी रात खेतों में पटवन कर रहे हैं और सुबह होते ही मजदूरों को बुलाकर नर्सरी से धान की पौध उखड़वाकर रोपनी शुरू करा रहे हैं. साथ ही ट्रैक्टर से खेतों की कदवा भी कराई जा रही है.
आद्रा नक्षत्र समाप्त होने से पहले रोपनी पूरी करने की चुनौती
किसानों का कहना है कि ताजा कदवा होने पर रोपनी के बाद पानी में घुली मिट्टी पौधों की जड़ों में अच्छी तरह बैठ जाती है, जिससे तेज हवा चलने पर पौधे उखड़ते नहीं हैं. वहीं बासी कदवा होने पर मजदूरों से अधिक गहराई में रोपनी करानी पड़ती है. पूर्वजों के समय से आद्रा नक्षत्र में धान रोपनी की परंपरा रही है, इसलिए किसान हर हाल में इस अवधि के भीतर रोपनी पूरी करने में जुटे हैं.
सीआरपीएफ जवान छुट्टी लेकर पहुंचे गांव
रतनपुर निवासी किसान एवं सीआरपीएफ जवान राम कुमार शाही ने बताया कि आद्रा नक्षत्र में रोपनी की परंपरा को निभाने के लिए वे विशेष अवकाश लेकर गांव आए हैं. उन्होंने कहा कि नक्षत्र समाप्त होने से पहले रोपनी का कार्य पूरा कर पुनः ड्यूटी पर लौट जाएंगे. उन्होंने बताया कि इलाके के अधिकांश पुरुष मजदूर धान रोपनी के लिए पंजाब चले गए हैं, जिससे महिला मजदूरों के भरोसे ही रोपनी का कार्य चल रहा है.
बिजली संकट से पटवन प्रभावित
राम कुमार शाही ने बताया कि सनहपुर पावर सब स्टेशन की जर्जर विद्युत व्यवस्था के कारण लगातार चार से पांच घंटे भी निर्बाध बिजली नहीं मिल रही है. हर तीन-चार घंटे पर आधे से एक घंटे तक बिजली बाधित हो जाती है, जिससे नलकूपों के जरिए पटवन प्रभावित हो रहा है और रोपनी का कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है.
खेतों में दिन-रात जुटे किसान
रतनपुर गांव के राज सिंघानिया, सुमन कुमार झा, कन्हैया झा, चंद्र मोहन झा, शेष नारायण झा समेत दर्जनों किसान अपने-अपने खेतों में रोपनी और पटवन की व्यवस्था में जुटे दिखे. कई किसान पटवन के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, जबकि अन्य ट्रैक्टर से कदवा कराने में व्यस्त थे.
अच्छी उपज की उम्मीद में बढ़ा रहे मेहनत
किसानों ने बताया कि घरेलू उपभोग के लिए मुख्य रूप से राजेंद्र स्वेता और कतरनी धान की खेती की जाती है, जबकि बाजार में बिक्री के लिए राजेंद्र मंसूरी किस्म को अधिक पसंद किया जाता है. किसानों के अनुसार प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद राजेंद्र स्वेता की उपज 60 से 70 किलो प्रति कट्ठा तथा राजेंद्र मंसूरी की उपज 70 से 80 किलो प्रति कट्ठा तक मिल जाती है.
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