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सफाई कर्मियों को वेतन नहीं मिलने से दम तोड़ रही डब्ल्यूपीयू योजना

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सफाई कर्मियों को वेतन नहीं मिलने से दम तोड़ रही डब्ल्यूपीयू योजना

बक्सर.

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छ भारत मिशन एवं लोहिया स्वच्छता बिहार योजना के तहत जिला के 136 पंचायतों में से 120 पंचायतों में करोड़ों रुपये की लागत से अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई यानी डब्ल्यूपीयू जिले में मुखिया की लापरवाही से दम तोड़ रहा है. इस योजना के तहत सफाई कर्मियों को एक साल तक डब्ल्यूपीयू के मद से वेतन का भुगतान करना था. एक साल 15वां वित्त आयोग के तहत पंचायतों के मुखिया को वेतन भुगतान करने की जवाबदेही सौंपी गयी है. मगर मुखिया की लूटखसोट के चलते सफाई कर्मियों का वेतन नहीं मिल रहा है. मामला कमीशन से जुड़ा है. हालांकि इस बाबत उप विकास आयुक्त ने डॉ महेंद्र पाल ने कहा कि मुखिया को पत्र भेजा गया है. वेतन नहीं दिये जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी. जबकि एक इकाई के भवन निर्माण पर लगभग सात लाख रुपये से लेकर 8 लाख रुपये खर्च किया गया है. उसके बाद लाखों रुपये के लागत से पंचायत में डस्टबिन, फॉग मशीन, इ-रिक्शा व अन्य सामग्रियों की खरीदारी किया गया था ताकि पंचायतों का शहर के तर्ज पर साफ सफाई हो सके. लेकिन डब्ल्यूपीयू का निर्माण कार्य होने के बाद जिला के इक्का-दुक्का प्रखंड की पंचायतों को छोड़कर अन्य पंचायत के इकाई में खाद बनाने का कार्य नहीं हो रहा है. न ही उन पंचायतों में सफाई का कार्य हो रहा है. सदर प्रखंड के कई पंचायतों में हालत तो यह है कि वेतन नहीं मिलने के कारण सफाई कर्मियों ने काम छोड़ दिया है. जिसके कारण गांव और सड़कों की सफाई नहीं होने के साथ-साथ कचरा का भी संग्रह नहीं हो रहा है. सड़कों पर पहले की तरह कचरे का ढेर लगना शुरू हो गया है. वहीं बरसात का मौसम भी दस्तक दे दिया है. गांव की नालियां भी बजबजा गई है, लेकिन उसका सफाई नहीं हो रहा है. करोड़ों का बना डब्ल्यूपीयू उपयोग नहीं होने से महज शोभा की वस्तु बनकर रह गयी है.

कचरा से तैयार खाद किसानों को मिलेगी सस्ते दर पर :

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना लोहिया स्वच्छ बिहार के तहत गांव के निकलने वाले कचरों डब्ल्यूपीयू के अलग-अलग चेंबर में रखने के लिए अलग-अलग चेंबर बनाया गया है. ताकि उस कचरा से खाद बनाया जा सके. चेंबर में प्लास्टिक, सूखा कचरा, गीला कचरा, शीशे की बोतल को अलग-अलग कर चैंबर के माध्यम से रखे जाने की तैयारी थी. जहां कचरा से तैयार खाद को किसानों को सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने की योजना थी. जो कचरा गलने लायक नहीं है, उसे कबाड़ी के हाथों बेचकर पंचायत के विकास कार्य में राशि को लगाये जाने का प्रावधान था. जिससे गांव में विकास की गति मिलने के साथ-साथ लोगों को रोजगार दिलाने का योजना तैयार किया जा सके, किंतु जिले के एक दो पंचायत छोड़ कर कहीं भी डब्ल्यूपीयू का उपयोग नहीं किया जा रहा है. अगर डब्ल्यूपीयू में पंचायत के कचड़ा से खाद बनाया जाता तो पंचायत के किसानों को जैविक खाद कम दर आसानी से उपलब्ध हो पाता.

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