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जिले में मौसम ने बदला मिजाज से किसानों में उत्साह

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जिले में मौसम ने बदला मिजाज से किसानों में उत्साह

बिहारशरीफ. जिले में पिछले पांच दिनों से मौसम में बदलाव का सिलसिला जारी है. कभी बादल, कभी हल्की बूंदाबांदी और कभी तीखी धूप के बीच किसानों की निगाहें आसमान की ओर टिकी रहीं. हालांकि रविवार को आसमान पूरी तरह साफ रहा और तीखी धूप के कारण गर्मी का असर भी ज्यादा महसूस किया गया. इसके बावजूद अब खेतों में हरियाली की शुरुआत होने लगी है, क्योंकि लोकाइन नदी में पानी आने के बाद किसानों ने धान की बिचड़ा बुआई की शुरू कर दी है. पिछले दो दिनों से लोकाइन नदी में पानी आने की खबर ने किसानों के चेहरों पर राहत की मुस्कान ला दी है. जिले के विभिन्न हिस्सों बेन, परवलपुर, इस्लामपुर, एकंगसराय, हिलसा, करायपरसुराय और हरनौत में अब खेतों की तैयारी और बिचड़ा डालने का कार्य शुरू हो गया है. किसान, जो अब तक बारिश का इंतजार कर रहे थे, अब परिस्थिति को देखते हुए जल उपलब्धता के हिसाब से बिचड़ा गिराने में जुट गए हैं. स्थानीय किसान रामजी महतो बताते हैं कि बूंदाबांदी से खेतों में अभी भरपूर नमी नहीं आई है, लेकिन नदी का पानी आने से आस-पास के खेतों में रोपाई की उम्मीद बन गई है. धीरे-धीरे खेतों में तैयारी हो रही है. हालांकि इन गतिविधियों के बीच एक चिंता यह भी है कि जिले में अभी तक पर्याप्त बारिश नहीं हुई है. मौसम विभाग के अनुसार पिछले पांच दिनों में केवल हल्की बूंदाबांदी दर्ज की गई, जो खेतों में पानी भरने के लिए नाकाफी रही. रविवार को आसमान साफ रहा और धूप तेज पड़ने के कारण उमस और गर्मी दोनों महसूस की गई. इस प्रकार के मौसम ने जहां खेती की तैयारियों को प्रभावित किया है, वहीं स्वास्थ्य पर भी असर दिखना शुरू हो गया है. बदलते तापमान और उमस के कारण सर्दी-खांसी, सिरदर्द और बुखार जैसे लक्षण लोगों में देखने को मिल रहे हैं. मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. आमतौर पर जून के तीसरे सप्ताह तक जिले में बिचड़े की बुआई प्रक्रिया तेज़ हो जाती है, लेकिन इस बार मानसून की गति धीमी रही है. इससे बिचड़ा गिराने के काम में देरी हुई. हालांकि जिन क्षेत्रों में सिंचाई के लिए नदी या अन्य जल स्रोत उपलब्ध हैं, वहां किसान तेजी से काम कर रहे हैं. किसानों का मानना है कि यदि अगले दो सप्ताह में अच्छी बारिश होती है, तो रोपाई का काम पूरे जिले में शुरू हो सकेगा. जलवायु परिवर्तन और मानसून की अनिश्चितता ने अब खेती को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है.

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