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बौद्ध स्थल रुक्मणी स्थान का होगा उत्खनन, मिलेंगे दुर्लभ अवशेष

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बौद्ध स्थल रुक्मणी स्थान का होगा उत्खनन, मिलेंगे दुर्लभ अवशेष

राजगीऱ नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय और नालंदा खुला विश्वविद्यालय से थोड़ी दूर रुक्मणी स्थान का उत्खनन दूसरी बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना अंचल द्वारा किया जायेगा. उत्खनन से पहले बुधवार को अधीक्षण पुरातत्वविद सुजीत नयन द्वारा पूजा अर्चना किया गया है. नालंदा का यह जगदीशपुर गांव अपने दामन में अनेकों गौरवशाली अतीत समेटे है. इस गांव में रुक्मिणी स्थान नामक एक टीला है, जो भगवान श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी के प्रेम का प्रतीक है. स्थानीय लोगों के अनुसार श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का मिलन इसी स्थल पर हुआ था. इसलिए इस स्थल का नाम रुक्मिणी स्थान पड़ा है. रुक्मणी स्थान के इस छोटे से मंदिर में देवी रुकमणी की नहीं, बल्कि महात्मा बुद्ध की भव्य प्रतिमा विराजमान है. पहली बार हुये उत्खनन से स्पष्ट हो गया है कि यह प्राचीन बौद्ध स्थल है. अधीक्षण पुरातत्वविद सुजीत नयन ने बताया कि यह ऐतिहासिक धरोहर 450 ई0 पूर्व कुमारगुप्त, हर्षवर्धन और पाल शासक से जुड़ा हुआ है. इस टीले की खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध की प्राचीनकालीन प्रतिमा मिली थी, जो इसी मंदिर में स्थापित की गयी है. इसके अलावा कई स्तूप, दर्जनों कमरा, गलियारा, मिट्टी के बर्तन, जले हुए टुकड़े आदि अवशेष मिले हैं. उन्होंने बताया कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष से करीब दो किमी दक्षिण-पश्चिम में यह स्थित है. टीले का माप लगभग 200×175 मीटर है. टीले का दक्षिण-पूर्व भाग टीले के शेष भाग की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा है. टीले के शीर्ष पर ग्रामीणों द्वारा एक आधुनिक मंदिर का निर्माण किया गया है, जिसमें भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की आदमकद से भी बड़ी बैठी हुई प्रतिमा स्थापित की गई है. बुद्ध की काली बेसाल्ट प्रतिमा पाल काल की है. प्रतिमा के स्तंभ पर बुद्ध के जन्म से लेकर उनके महापरिनिर्वाण तक के जीवन-दृश्य अंकित हैं. मूर्ति के आधार पर मार-विजय की घटना को दर्शाया गया है. टीले पर लाल मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े बिखरे पाये गये हैं. उन्होंने बताया कि रुक्मणी स्थान के उत्खनन से अनेकों बहुमूल्य और दुर्लभ अवशेष मिलने की उम्मीद है.

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