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धान के देसी किस्म का बीता समय, हाइब्रीड का भरोसा

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धान के देसी किस्म का बीता समय, हाइब्रीड का भरोसा

जिले में खरीफ फसल के तहत धान रोपाई का लक्ष्य 52 हजार हेक्टेयर है. इसके लिए बिचड़ा 5200 हेक्टेयर में लगना है. आम तौर पर इस वक्त तक 55 से 60 फीसदी तक बिचड़े की बुआई हो जाती थी, लेकिन इस बार महज 2.8 प्रतिशत ही हो सकी है. मानसून की बारिश में हो रही देरी से किसान परेशान हैं. धान के देसी किस्म के धान का बिचड़ा बोने का समय लगभग समाप्त होने काे है. अब किसानों को हाइब्रीड धान के बिचड़ा का ही भरोसा है.

बारिश पर निर्भर है 80 फीसदी खेती

बिचड़ा बुआई नहीं करने का मूल कारण जिले के अधिकतर धान उत्पादक क्षेत्रों में बारिश के अलावा सिंचाई का साधन नहीं होना है. जिले के नौ प्रखंडों कहलगांव, सन्हौला, गोराडीह, सुल्तानगंज, शाहकुंड, नाथनगर, सबौर, जगदीशपुर व पीरपैंती में धान उत्पादन अधिक होता है. इन क्षेत्रों में सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. किसानों को दो साल पहले यहां पर सुखाड़ का दंश झेलना पड़ा था. जिला कृषि पदाधिकारी अनिल यादव ने बताया कि जिले में 80 फीसदी से अधिक भूमि की खेती बारिश पर ही निर्भर है. पूरे साल जितनी बारिश होती है, उसमें औसतन 70 फीसदी पानी केवल मानसून में बरसता है. ऐसे में यदि किसान जीरो टिलेज व बॉग विधि से खेती का विकल्प नहीं चुनेंगे तो धान का उत्पादन घट जायेगा.

कृषि विभाग जीरो टिलेज विधि से खेती को दे रहा है बढ़ावा

एक ओर जहां सिंचाई के अभाव में धान की खेती कैसे हो, इसके लिए किसानों में चिंता दिख रही है. वहीं दूसरी ओर कृषि विभाग बेमौसम बारिश, मानसून में कम बारिश होने से जीरो टिलेज जैसे तकनीकी खेती को बढ़ावा दे रहा है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बॉग व जीरो टिलेज विधि से किसानों को कई प्रकार के लाभ हैं. इसमें सिंचाई के लिए 30 से 40 फीसदी कम पानी की जरूरत पड़ती है. रोपा की अपेक्षा मजदूर खर्च, जुताई खर्च आदि 50 प्रतिशत कम पड़ता है. खर पतवार को नियंत्रित करने में दिक्कत नहीं होती है.

सहभागी किस्म उपयुक्त

कम पानी के लिए सहभागी किस्म के धान अधिक उपयुक्त है, जबकि अधिक पानी के लिए स्वर्णा सब वन धान उपयुक्त है. जिला कृषि कार्यालय की ओर से जिले में इस बार धान आच्छादन का लक्ष्य कुल 52 हजार हेक्टेयर रखा गया है. इसमें 5200 हेक्टेयर भूमि में बिचड़ा लगाना जरूरी है. अब तक मात्र 128 हेक्टेयर भूमि में बिचड़ा लगा है. किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है. केवल शाहकुंड, सुल्तानगंज, नाथनगर क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक बिचड़ा लगा है. जहां भी बिचड़ा लगा है, वहां पानी के अभाव में पीले पड़ रहे हैं. बारिश के अभाव में बार-बार किसानों के लिए सिंचाई करना मुश्किल हो रहा है.

कम पानी में कम अवधि और मध्यम अवधि वाले प्रभेद जरूरी

मॉनसून में देरी से प्रभावित किसानों के लिए मध्यम व कम अवधि वाले धान की खेती करना अधिक लाभकारी है. सामान्य या अधिक अवधि वाले धान का उत्पादन 140 से 150 दिन में होता है, जबकि कम अवधि में 90 से 100 दिन में धान तैयार हो जाता है. कम अवधि वाले धान के प्रभेद में राजेंद्र श्वेता, भगवती, प्रभात, सहभागी व तुरंता शामिल हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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