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Home बिहार भागलपुर भोपाल के बाद अब बेंगलुरु में पवन सागर ने 13 प्रांतों के कलाकारों के बीच गाड़ा मंजूषा कला का झंडा

भोपाल के बाद अब बेंगलुरु में पवन सागर ने 13 प्रांतों के कलाकारों के बीच गाड़ा मंजूषा कला का झंडा

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भोपाल के बाद अब बेंगलुरु में पवन सागर ने 13 प्रांतों के कलाकारों के बीच गाड़ा मंजूषा कला का झंडा
पवन सागर

भागलपुर से दीपक राव की रिपोर्ट

Bhagalpur Manjusha Art: सिल्क सिटी और अंग क्षेत्र की ऐतिहासिक लोक कला ‘मंजूषा’ अब देश के कोने-कोने में अपनी अनूठी पहचान दर्ज करा रही है. भोपाल में अपनी कला का जादू बिखेरने के महज एक महीने के भीतर, मंजूषा कला ने अब बेंगलुरु (कर्नाटक) में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में भी अपनी सफलता का झंडा गाड़ दिया है. भारतीय विद्या भवन, बेंगलुरु के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित ‘चित्र भारती राष्ट्रीय कार्यशाला’ में भागलपुर के निर्मला देवी घराना से ताल्लुक रखने वाले और राज्य पुरस्कार (स्टेट अवार्ड) से सम्मानित कलाकार पवन कुमार सागर ने बिहार का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व किया.

13 राज्यों के बीच मंजूषा के ‘तीन रंगों’ का प्रदर्शन

  • राष्ट्रीय मंच पर भागीदारी: 22 से 26 जून तक आयोजित इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में देश के 13 राज्यों से आए 15 विभिन्न लोक कलाओं के कुल 50 शीर्ष कलाकारों ने हिस्सा लिया.
  • रंग विन्यास का जादू: मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित के नेतृत्व में कलाकार पवन कुमार सागर ने मंजूषा कला के विशेष तीन रंगों के रंग विन्यास को कैनवास पर उकेरा. उन्होंने कला के प्रदर्शन के साथ-साथ भागलपुर की पौराणिक बिहुला-विषहरी लोकगाथा का भी राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार-प्रसार किया.
  • बिहार के अन्य दिग्गज: इस कार्यशाला में बिहार की ओर से टिकुली कला में पद्मश्री से सम्मानित अशोक कुमार विश्वास, मधुबनी पेंटिंग में सरवन पासवान और गोदना कला में उर्मिला देवी ने भी राज्य का प्रतिनिधित्व किया.

दक्षिण भारत में तेजी से पैर पसार रही है मंजूषा कला

मंजूषा कला के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विस्तार को लेकर कला विशेषज्ञों में भारी उत्साह है. मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित ने गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि अब अंग क्षेत्र की यह लोक कला किसी पहचान की मोहताज नहीं है. यह कला अब अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थापित हो रही है. कलाकार पवन कुमार सागर वर्तमान में दक्षिण भारत (साउथ इंडिया) में मंजूषा कला के विस्तार पर विशेष रूप से काम कर रहे हैं. केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में उनके शिष्य इस कला को संवारने और इसका प्रचार-प्रसार करने में जुटे हैं.

भोपाल के ‘सदानीरा समाधान 2026’ में भी बिखेरा था जलवा

गौरतलब है कि इससे पहले 27 मई से 2 जून, 2026 तक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित सात दिवसीय ‘सदानीरा समाधान 2026’ पारंपरिक कला कार्यशाला में भी मंजूषा कला आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी थी. वीर भारत न्यास एवं मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित उस शिविर में देशभर के 67 लोक कला विशेषज्ञों के बीच पवन कुमार सागर ने अपनी कला से विशेषज्ञों को मंत्रमुग्ध कर दिया था.

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Bhagalpur Manjusha Art: कला का इतिहास और रंगों का धार्मिक महत्व

  1. पारंपरिक संरक्षण: इस लोक कला को प्राचीन काल से मुख्य रूप से कुम्हार और मालाकार समुदाय द्वारा जीवित रखा गया है. पहले कुम्हार समुदाय मंजूषा के पवित्र मिट्टी के कलश तैयार करता था, जबकि मालाकार समुदाय मंजूषा की सुंदर आकृतियों का निर्माण करता था.
  2. तीन मुख्य रंग: इस कला में केवल तीन रंगों—हरा, पीला और गुलाबी का ही प्रयोग होता है. इसमें हरा रंग प्रकृति की हरियाली व खुशहाली का, पीला रंग समृद्धि व चौमुखी विकास का और गुलाबी रंग मानवीय प्रेम व सौहार्द का जीवंत प्रतीक माना जाता है.

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