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Home बिहार बेतिया राष्ट्रीय वेबीनार में पृथ्वी – पर्यावरण बचाने के लिए हुआ मंथन, जानें किसने क्या कहा ?

राष्ट्रीय वेबीनार में पृथ्वी – पर्यावरण बचाने के लिए हुआ मंथन, जानें किसने क्या कहा ?

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राष्ट्रीय वेबीनार में पृथ्वी – पर्यावरण बचाने के लिए हुआ मंथन, जानें किसने क्या कहा ?

बेतिया. मातृ-पृथ्वी दिवस पर गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज बगहा, करीम सिटी कॉलेज जमशेदपुर, पीजी यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ़ जियोग्राफी के संयुक्त तत्वाधान में “ग्रीडिनेस एंड इट्स इम्पैक्ट ऑन द एनवायरनमेंट ऑफ़ अर्थ ” विषयक पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन कॉलेज के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवींद्र कुमार चौधरी की अध्यक्षता में सोमवार की देर शाम तक संपन्न हुआ. अपने संबोधन में .प्रो. चौधरी ने कहा कि पृथ्वी के ज्ञानी जीवों में हम मानव ही सर्वश्रेष्ठ हैं. लेकिन हम अपनी लालची सोंच और अति महत्वाकांक्षी क्रिया कलापों के द्वारा अपने पृथ्वी और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है. जिसके कारण अब पृथ्वी के समूल जीव जगत के लिए भयंकर हालात पैदा कर दिया है. पृथ्वी व पर्यावरण के स्वास्थ को बेहतर करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक पेड़ लगाना अनिवार्य है. बी एन मंडल यूनिवर्सिटी मधेपुरा, भूगोल विभाग के पूर्व अध्यक्ष, डीन, व वर्तमान में लोकपाल व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. शिवमुनी यादव ने कहा कि हमारी सनातनी संस्कृति के साथ-साथ इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म भी पर्यावरण संरक्षण के हिमायती है.कार्यक्रम के उद्बोधन भाषण यूनिवर्सिटी हेड प्रो.ज़फर इमाम व करीम सिटी कॉलेज जमशेदपुर के प्राचार्य डॉ मोहम्मद रेयाज़ ने पृथ्वी दिवस पर पर्यावरण संरक्षण के लिए कारगर उपाय करने पर बल दिया. कीनोट स्पीकर डॉ ए. अली ने पृथ्वी को नुकसान पहुंचाने वाले सभी आयामों पर ध्यान केंद्रीत किया. कार्यक्रम में बतौर वक्ता वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी आरा के डॉ सदफ ने जलवायु परिवर्तन से बिहार के सर्वाधिक प्रभावित जिलों अररिया, किशनगंज, खगड़िया, मुजफ्फरपुर, सिवान, पूर्वी चम्पारण, गोपालगंज आदि का उल्लेख करते हुए बताया कि इसका असर कृषि फसलों के उत्पादन के साथ जन जीवन पर व्यापक रूप से पड़ रहा है. एडमास यूनिवर्सिटी कोलकाता के डॉ कस्तूरी मुख़र्जी ने मृदा अपरदन तथा मिट्टी की गुणवत्ता में लगातार गिरावट का असर कृषि उत्पादों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उन्होंने ने मिट्टीयों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए अपना महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया.भूगोल विभाग के सहायक प्रोफेसर नेहाल अहमद ने मंच संचालन के क्रम में बताया कि 22 अप्रैल 1970 से इस पृथ्वी दिवस को मनाने की परंपरा शुरू हुई थी तथा 2009 से ””””””””मातृ”””””””” शब्द इस दिवस में जोड़कर पृथ्वी को बचाने का संकल्प लिया गया. किन्तु जंगल जल, ज़मीन का जब तक संरक्षण नहीं करेंगे तब तक इस दिवस का उद्देश्य फलिभूत नहीं हो सकेगा. कार्यक्रम के अंत में यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट के डॉ शिरीन हयात ने धन्यवाद ज्ञापित किया. इस मौके पर संयोजक डॉ रेखा श्रीवास्तव,डॉ गजेंद्र तिवारी, डॉ रमेश सिंह, डॉ राकेश सिंह, डॉ राजेश कुमार चंदेल, मदन बानिक, राजन तिवारी, मनोहर कुमार, धर्मेश नंदा, डॉ नीलाम्बरी गुप्ता के अलावा सैकड़ों विद्यार्थियों की सहभागिता रही.

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