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Home बिहार बेगूसराय बेगूसराय के वनद्वार का ऐतिहासिक कुआं बना गांव की नई पहचान, सिर्फ जल स्रोत नहीं, सामाजिक चेतना का प्रतीक है ऐतिहासिक कुआं

बेगूसराय के वनद्वार का ऐतिहासिक कुआं बना गांव की नई पहचान, सिर्फ जल स्रोत नहीं, सामाजिक चेतना का प्रतीक है ऐतिहासिक कुआं

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बेगूसराय के वनद्वार का ऐतिहासिक कुआं बना गांव की नई पहचान, सिर्फ जल स्रोत नहीं, सामाजिक चेतना का प्रतीक है ऐतिहासिक कुआं
वनद्वार स्थित कुआं

Begusarai News :  गांवों की पहचान सिर्फ उनकी गलियों, खेतों और मंदिरों से नहीं होती,बल्कि उन सार्वजनिक स्थलों से भी होती है जहां लोग एकत्र होकर समाज, राजनीति और देश-दुनिया की चर्चा करते हैं. ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है बेगूसराय के वनद्वार स्थित कुआं, जो वर्षों बाद भी अपनी सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को जीवित रखे हुए है. कभी समय की मार झेलकर क्षतिग्रस्त हो चुका इस कुएं का मुहरा अब पूरी तरह बदला हुआ नजर आता है.

दिन में आकर्षण, शाम को चौपाल

नए स्वरूप में सजा-संवरा यह कुआं गांव की शान बन गया है. चमचमाती सतह आकर्षक रंग-रोगन और आधुनिक प्रकाश व्यवस्था इसे नई पहचान दे रही है. रात के समय लगाई गई तेज रोशनी से पूरा परिसर जगमगा उठता है और लोगों की आंखें चौंधिया जाती हैं. हालांकि कुएं का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है. जो वर्षों पहले जिस तरह यहां शाम ढलते ही गांव के बुजुर्ग, युवा और जागरूक लोग चौकड़ी जमाते थे, वही परंपरा आज भी कायम है.

खेती, शिक्षा, राजनीति और विकास पर हर रोज होती है खुली चर्चा

हर शाम यहां लोगों का जमावड़ा लगता है और चर्चा का दायरा गांव की समस्याओं से लेकर राज्य, देश और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं तक पहुंच जाता है. स्थानीय मनोज सिंह,प्रशांत पाठक,सरोज कुमार,विपिन सिंह, संजय सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि यह कुआं केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि गांव का अनौपचारिक बौद्धिक मंच रहा है. यहां बैठकर सामाजिक मुद्दों, खेती-किसानी, शिक्षा, राजनीति और विकास से जुड़े विषयों पर खुलकर विचार-विमर्श होता है. कई महत्वपूर्ण सामाजिक निर्णयों और जनहित के मुद्दों की शुरुआत भी इसी चौपाल से हुई है.

बेहतर सुविधाओं के बावजूद बरकरार है वनद्वार के ऐतिहासिक कुएं की मूल पहचान

ग्रामीणों का मानना है कि आधुनिकता के इस दौर में जहां चौपाल और सामुदायिक संवाद की परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, वहीं वनद्वार का यह कुआं आज भी लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है.बदले हुए स्वरूप और बेहतर सुविधाओं के बावजूद इसकी मूल पहचान बरकरार है. वनद्वार का यह कुआं आज भी सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि गांव की सामाजिक चेतना, संवाद और बौद्धिक परंपरा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है.

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