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Home बिहार बांका बौंसी में 30 साल बाद लौटा बिछड़ा बेटा, सोशल मीडिया ने निभायी बड़ी भूमिका

बौंसी में 30 साल बाद लौटा बिछड़ा बेटा, सोशल मीडिया ने निभायी बड़ी भूमिका

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बौंसी में 30 साल बाद लौटा बिछड़ा बेटा, सोशल मीडिया ने निभायी बड़ी भूमिका

बौसी, ( बांका ) से संजीव पाठक की रिपोर्ट

Banka News : बौसी प्रखंड के डहुआ गांव में एक ऐसी भावुक घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को भाव-विभोर कर दिया. वर्ष 1997 में महज 14 वर्ष की उम्र में परिवार से बिछड़ा मिन्तुल्लाह करीब 30 साल बाद अपने घर लौट आया. बेटे को सामने देखकर वृद्ध मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े, जबकि गांव में जश्न जैसा माहौल बन गया. इस पुनर्मिलन में सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई.

मेरठ की भीड़ में बिछड़ा, कटिहार पहुंचकर बदल गई जिंदगी

डहुआ गांव निवासी स्वर्गीय फैजुल अंसारी का पुत्र मिन्तुल्लाह रोजगार की तलाश में अपने चाचा नुरुल अंसारी के साथ मेरठ गया था. इसी दौरान वह भीड़भाड़ में अपने चाचा से बिछड़ गया. घर लौटने की कोशिश में वह गलत ट्रेन में सवार हो गया और भटकते हुए कटिहार पहुंच गया. उस दौर में मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाएं नहीं थीं, जिसके कारण वह अपने परिवार से संपर्क नहीं कर सका.

बेसहारा बच्चे को मिला नया परिवार, बन गया ”रहमत”

कटिहार में एक स्थानीय व्यक्ति ने उसे सहारा दिया और अपने परिवार का सदस्य बना लिया. यहीं उसका नाम बदलकर ”रहमत” रख दिया गया. समय के साथ उसने नई जिंदगी शुरू की, विवाह किया और आज वह दो बेटों और एक बेटी का पिता है. परिवार से दूर रहकर भी उसके मन में कहीं न कहीं अपने अतीत की यादें जीवित रहीं.

सोशल मीडिया ने जोड़ी 30 साल पुरानी टूटी कड़ी

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रहमत की कहानी सामने आने लगी. कुछ लोगों ने उसके अतीत और पैतृक गांव से जुड़ी जानकारी साझा की. इसके बाद डहुआ गांव के लोगों ने पहचान की कड़ियों को जोड़ना शुरू किया. परिजनों और ग्रामीणों की जांच-पड़ताल के बाद यह पुष्टि हुई कि रहमत ही वर्षों पहले लापता हुआ मिन्तुल्लाह है.

मां-बेटे का मिलन देख नम हो गईं सबकी आंखें

सच्चाई सामने आने के बाद गांव के चार लोग कटिहार पहुंचे और रहमत को उसके परिवार सहित डहुआ लेकर आए. गांव पहुंचते ही वर्षों से बेटे की राह देख रही मां ने उसे गले से लगा लिया. मां-बेटे के इस भावुक मिलन को देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं. पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई और लोगों की भीड़ उसे देखने उमड़ पड़ी.

उम्मीद, इंसानियत और तकनीक की मिसाल बनी यह कहानी

ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की घर वापसी नहीं, बल्कि उम्मीद, इंसानियत और आधुनिक तकनीक की ताकत का जीवंत उदाहरण है. डहुआ गांव में आज भी इस चमत्कारिक पुनर्मिलन की चर्चा हर चौपाल और हर घर में हो रही है. यह कहानी साबित करती है कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, रिश्तों की डोर कभी पूरी तरह नहीं टूटती.

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