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Home बिहार बांका गांव के चौपाल से विलुप्त होती जा रही है फागुनी गीत की लोक परंपरा, दो दिवसीय कार्यक्रम के तरह ना हो जाये होली का त्योहार

गांव के चौपाल से विलुप्त होती जा रही है फागुनी गीत की लोक परंपरा, दो दिवसीय कार्यक्रम के तरह ना हो जाये होली का त्योहार

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गांव के चौपाल से विलुप्त होती जा रही है फागुनी गीत की लोक परंपरा, दो दिवसीय कार्यक्रम के तरह ना हो जाये होली का त्योहार

-फाग व लोकधुनों की मिठास को निगल रहा डीजे का शोर, नये पीढ़ी के युवा नहीं गा पाते है होली गीत. -आधुनिकता की चकाचौंध और बाजारवादी संस्कृति की वजह से अब सिमट कर रह गयी फाग गायकी की परंपरा. चंदन कुमार, बांका. जिलेभर के बाजार में होली का रंग अब धीरे-धीरे चढ़ने लगा है. हालांकि होली का त्योहार होने में महज दस दिन शेष रह गये है. लेकिन अभी शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में होली का माहौल देखने को नहीं मिल रहा है. ऐसा लग रहा है कि होली का त्योहार भी अब दो दिवसीय कार्यक्रम के तरह ना हो जाये. एक समय था जब होली के कई दिन पूर्व से ही गांवों में फाग गाने वाली मंडलियां दिखाई देने लगती. जगह-जगह पर लोक कलाकारों के कार्यक्रम होते, लेकिन अब डीजे के चलन के चलते सब कम हो गया. मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी के दिन से ही होली की शुरुआत मानी जाती थी और इसी के साथ होली की मस्ती शुरू हो जाती थी. गांवों में फागुनी गीत गाये जाते थे जो होली के बाद तक चलते थे. इस दौरान होली खेले रघुबीरा अवध में, आज विरज में होली रे रसिया, बम भोले बाबा बम भोले बाबा कहां रंगवल पागरिया.. गाती हुरियारों की मंडली घूमती थी तो अनायास ही मन होलियाना हो जाता था. अब शहर से लेकर ग्रामीण इलाके से फागुनी गीतों की लोक परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं. होली का पर्व नजदीक आने के बावजूद अब गांवों में होली गीत, फगुआ, चैता, लचारी आदि गीत सुनाई नहीं दे रहा है. जबकि दो दशक पूर्व बसंत पंचमी के बाद से ही फाग गीत अपनी मधुर धुन से सभी को अपनी ओर आकर्षित करते थे. अब पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति युवाओं पर इस कदर हावी हो गयी है कि पुरानी लोकगीत और परंपराएं विलुप्त होती नजर आ रहीं है. इस भागम भाग भरी दुनिया में गांव भी इतना आगे निकल गया है कि अपनी लोक परंपरा को भूल गया है. एक समय था जब फागुन महीना चढ़ते ही गांव-गांव में फागुनी गीत सुनाई देते थे. बड़े, बूढ़े, जवान, सभी एक साथ मंदिर, मैदान, चौपाल या गांव के किसी व्यक्ति के दरवाजे पर शाम होते ही बैठ जाते थे. ढोलक, हारमोनियम, झांझ और मंजीरे की धुन पर सुर में सुर मिलाते थे. कभी होली गीत, फगुआ, चैता, कभी लचारी आदि लोकगीतों की धुन पर जैसे पूरा गांव ही फागुनी बयार में डूब जाता था. इन गीतों से गांव की एकता और परस्पर प्रेम परवान चढ़ता था. समय के साथ जैसे-जैसे यह लोग गीत और परंपराएं गायब हो रही हैं वैसे ही गांव की एकता, परस्पर प्रेम और आदर भी विनील होता जा रहा है. -आधुनिकता के दौर में गुम हो गये फाल्गुन गीत. गांव का कोई चौपाल. बीच में ढोलक और मंजीरा रखा हुआ और 15-20 ग्रामीण बैठे हुए है. तभी गांव का एक बुजुर्ग आये और हो गये शुरू फागुन में श्याम,खेलत होली….सोना के मंदिरवा में चांदी लगल केवाड़, कान्हा तनी सारी दुनियां दर्शानावा दीह… ! ढोल -मंजीरा संभाले दो युवक देने लगे जोगिरा ताल और देर रात तक चलता रहा जोगिरा सा रा रा., वाह… भाई… वाह… ! सचमुच कितना अच्छा लगता था. साथ में बैठकर एक साथ ”फगुआ” गाकर प्रेम बढ़ाना, लेकिन अब ये दृश्य न जाने क्यों गांवों में भी देखने को नहीं मिलते. गांव की बसंती पुरवैया हवा में बलखाते होली गीत के स्वर अब कानों की गूंज से दूर होते जा रहे हैं. अब इसकी जगह टीवी, रेडियो, मोबाइल ने ले लिया है. एक जमाना था जब लोग घर-घर जाकर फगुआ गाकर लोगों को आपस में गले मिलवाते थे. दूर-दूर से लोग चौपाल में आकर फाग का आनंद उठाते थे. अब वो वाली बात नहीं रही. सब कुछ समय के साथ बदल चुका है. एक दौर था जब वसंत पंचमी के बाद फाल्गुन माह आते ही जगह-जगह पर फाग गीतों के लिए अलग से व्यवस्था की जाती थी. शाम ढलते ही ढोल-नगाड़े की शोर लोगों को घर से निकलने के लिए विवश कर देती थी और साथ मिल बैठ कर स्वास्थ्य पारंपरिक गीतों का ऐसा महफिल जमता था कि राह चलने वाले भी कुछ पल ठहर कर इस मस्ती भरे पल को अपने जेहन में उतार लेना चाहते थे. अब न वह टोली दिखती है और न ही ढोल व मंजीरा. यह परंपरा भी अब विलुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी है. -रंगों से सराबोर कर देने वाली होली में मिठास घोलने वाली जोगीरा… की बोली भी अब खमोश हो गयी है. फाग का राग, ढोलक की थाप और झांझो की झंकार में जो मिठास था, अब वह मिठास डीजे की कान फाडू शोर में गुम हो गया है. एक जमाना था, जब बसंत पंचमी के दिन से ही घर-घर घूमकर लोग फाग गाते थे और होली के बाद लगभग एक पखवाड़े तक चैता गाकर आनंद उठाते थे. अब यह परंपरा गांवों से लुप्त हो गयी है. नई पीढ़ी फिल्मी व भोजपुरी गीतों की ओर आकर्षित है. उन्होंने होली के गीत गाने भी नहीं आता है. -होली पर पहले जैसी अब नही दिखती फाग की फुहारें. एक दशक पूर्व तक माघ महीने से ही गांव में फागुनी आहट दिखने लगती थी, लेकिन आज फागुन माह में भी शहरी व ग्रामीण इलाका फागुनी महफिलों से अछूते नजर आ रहे हैं. आज जहां पुष्प मंजरी, बसंत की अंगड़ाई, पछुआ हवा की सरसराहट फागुन का स्पष्ट संकेत दे रही है. लेकिन इस आधुनिकता की दौड़ में हमारी परंपराएं निढाल हो गयी है. फागुन महीने में शहरों से लेकर गांवों तक में फाग गाने और ढोलक की थाप सुनने को लोगों के कान तरस रहे हैं. जबकि पूर्व में महाशिवरात्रि का पर्व आते-आते फाग गीतों की धूम मचती थी. ढोल मंजीरे व करताल की आवाजों के बीच फगुआ के गाने गूंजते थे लेकिन आज भेदभाव एवं वैमन्सयता के चलते अब त्योहारों के भी कोई मायने नहीं रह गये हैं. -होली के त्योहार पर फाग गायन का विशेष महत्व है फाग गायन संगीत की एक विशेष कला है. जिसमें रागों के साथ ताल का भी मेल होता है. जहां गांवों में लंगड़ी व अन्य प्रकार की फाग गायी जाती है. आज विरज में होरी रे रसिया, वह आये नन्द के लाल, मथुरा में केसर बह आयी, मोरी चुनरी में पड़ गयो दाग री कैसों चटक रंग डारों, रंग डारो न हम पे पडू पईया, होली खेलन आयो रे घन श्याम, फाग खेलन बरसाने में आये हैं नटवर नन्द किशोर, मिलन सुदामा आये है, श्याम ने बिन पूछे धरी होरी राग व ताल के साथ ढोलक जैसे बाद्य यंत्रों की धुनों पर किया जाता है.

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