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Home बिहार बांका जो न कभी झुके, न कभी रुके… बांका की राजनीति में आज भी जिंदा है ‘दादा’ की विरासत

जो न कभी झुके, न कभी रुके… बांका की राजनीति में आज भी जिंदा है ‘दादा’ की विरासत

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जो न कभी झुके, न कभी रुके… बांका की राजनीति में आज भी जिंदा है ‘दादा’ की विरासत
स्व दिग्विजय सिंह का फाइल फोटो.

कटोरिया (बांका) से दीपक चौधरी की रिपोर्ट

Digvijay Singh Death Anniversary: बांका की राजनीति में यदि किसी नाम ने जनसेवा, सादगी, स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों की अमिट छाप छोड़ी है, तो वह नाम है स्वर्गीय दिग्विजय सिंह. पूर्व केंद्रीय मंत्री और बांका के पूर्व सांसद रहे दिग्विजय सिंह को लोग आज भी प्यार से ‘दादा’ के नाम से याद करते हैं. उनकी पुण्यतिथि पर जिलेभर में लोग उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण कर रहे हैं.

दादा उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज और आमजन की सेवा का माध्यम माना. यही कारण है कि वर्षों बाद भी उनका व्यक्तित्व और कार्यशैली लोगों की स्मृतियों में जीवित है.

मुख्य बातें

1989 में शुरू हुआ था बांका से राजनीतिक सफर

दिग्विजय सिंह ने वर्ष 1989 में बांका की धरती से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. इसके बाद करीब ढाई दशक तक उन्होंने जनप्रतिनिधि के रूप में ऐसी पहचान बनाई, जो आज भी राजनीतिक आदर्श के रूप में देखी जाती है.

उन्होंने कभी भी राजनीतिक लाभ के लिए अपने सिद्धांतों या व्यक्तित्व से समझौता नहीं किया. जीत और हार को समान भाव से स्वीकार करना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल था. सफलता ने उन्हें कभी अहंकारी नहीं बनाया और पराजय उन्हें कभी निराश नहीं कर सकी.

Digvijay Singh Death Anniversary: आडंबर और पाखंड के खिलाफ बुलंद रही आवाज

दादा आडंबर, अंधविश्वास और पाखंड के कट्टर विरोधी थे. वे वैज्ञानिक सोच, सामाजिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों के समर्थक रहे. उनकी राजनीति जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रवाद की सीमाओं से ऊपर उठकर सर्वसमाज को साथ लेकर चलने वाली थी.

राजनीति के लंबे सफर में भी उन पर कभी संकीर्ण सोच या जातिवाद का आरोप नहीं लगा. वे ऐसे दौर की राजनीति के प्रतिनिधि थे, जहां व्यक्तिगत ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता को सर्वोच्च महत्व दिया जाता था.

जनता का भरोसा ही थी उनकी सबसे बड़ी ताकत

गरीबी, बेरोजगारी, अन्याय, शोषण और सामाजिक विषमताओं के खिलाफ दादा जीवनभर संघर्ष करते रहे. चुनाव लड़ने का उनका तरीका भी अन्य नेताओं से अलग था. वे बड़े राजनीतिक तामझाम, भीड़ जुटाने की रणनीति या संगठनात्मक शक्ति के बजाय सीधे जनता के बीच संवाद पर भरोसा करते थे.

व्यक्तिगत संपर्क, सहज व्यवहार और जनविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी थी. यही कारण था कि वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि जनता के बीच एक विश्वास का नाम बन गए थे.

राजनीति से आगे एक विचार थे दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह केवल एक राजनेता नहीं थे. वे एक विचार, एक मूल्य और जनसेवा की ऐसी परंपरा थे, जिसकी चर्चा आज भी बांका और आसपास के क्षेत्रों में सम्मान के साथ की जाती है. उनकी सादगी, स्पष्टवादिता और समाज के प्रति समर्पण नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

पुण्यतिथि के अवसर पर लोग उन्हें याद करते हुए यही कहते हैं कि दादा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, संघर्ष और जनसेवा की विरासत आज भी बांका की राजनीतिक और सामाजिक चेतना में जीवित है.

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