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जयपुर दुर्गा मंदिर में मत्था टेकने झारखंड से भी पहुंचते हैं भक्त

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जयपुर दुर्गा मंदिर में मत्था टेकने झारखंड से भी पहुंचते हैं भक्त

लक्ष्मण कुमार मंटु, जयपुर बिहार व झारखंड बार्डर पर स्थित जयपुर दुर्गा मंदिर एक शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है. इस मनोकामना सिद्ध शक्तिपीठ में मन्नतें पूरा होने पर श्रद्धालुओं द्वारा डाक चढ़ाने की परंपरा आज भी जारी है. यहां आगामी 2035 तक डाक चढ़ाने की एडवांस बुकिंग हो चुकी है. श्रद्धालुओं द्वारा डाक के रूप में प्रतिमा सजावट के लिए डाक की कीमत लगभग 18 से 20 हजार जमा दी जाती है. इस शक्तिपीठ मंदिर की ख्याति का असर यह है कि मनोकामना पूर्ण होने वाले श्रद्धालुओं में डाक चढ़ाने की होड़ लगी है. इस मंदिर का इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना है. जयपुर के अवकाश प्राप्त शिक्षक जनार्दन मालाकार बताते हैं कि बंगाल से आये प्रवासी घटक समाज के मेढ़पति ने बांग्ला रीति रिवाज से जयपुर में दुर्गा पूजा की स्थापना की थी. शुरुआती दौर में खजूर के पत्ते एवं फूस के बने मंदिर में पूजा की जाती थी. इस भव्य मंदिर में आज भी बांग्ला पद्धति से दुर्गा उपासना की जाती है इस मंदिर में अष्टमी के दिन दंड प्रणाम की परंपरा अभी भी चल रही है. -कहते हैं समिति के अध्यक्ष समिति के अध्यक्ष मनोज कुमार रजनी ने बताया कि इस बार दुर्गा मंदिर में प्रतिमा निर्माण का खर्च कृष्णा प्रसाद साह द्वारा किया जा रहा है. जबकि मंदिर की सजावट लाइटिंग की व्यवस्था मुंबई के जयपुर प्रवासी युवाओं द्वारा शुरू से किया जाता रहा है. डाक चढ़ाने वालों का नंबर 2035 तक लगा हुआ है. वहीं मेढ़पती जयशंकर पांडेय का कहना है कि सच्चे मन से मांगी हर मुरादें इस देवी दुर्गा शक्तिपीठ मंदिर में पूरी होती है. पूजा में अहम भूमिका निभाने वालों में कोषाध्यक्ष मोहन साह, उपाध्यक्ष अनिल मंडल, उपसचिव मोहन मिश्रा, सदस्य बालमुकुंद मिश्र, मुकेश कुमार मिश्रा, जयप्रकाश मंडल, पप्पू मंडल, मनोहर साह, अमर चौधरी, नरेंद्र कुमार दत्त, गुलाब मिश्रा, संतोष साह आदि शामिल हैं.

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