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Home बिहार बांका सुबह पांच बजे खुला मंदार तराई स्थित अष्टकमल मंदिर का पट, शाम 6:30 बजे होगी महाआरती

सुबह पांच बजे खुला मंदार तराई स्थित अष्टकमल मंदिर का पट, शाम 6:30 बजे होगी महाआरती

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सुबह पांच बजे खुला मंदार तराई स्थित अष्टकमल मंदिर का पट, शाम 6:30 बजे होगी महाआरती

बांका से चंदन कुमार की रिपोर्ट

Banka News : बांका जिले के बौंसी प्रखंड स्थित मंदार पर्वत की तलहटी में स्थित अष्टकमल मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया. सुबह 5 बजे मंदिर का पट खुलते ही भक्तों की कतारें लगनी शुरू हो गईं. पूरे दिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा और मंदिर परिसर जयकारों से गूंजता रहा. यहां भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की गई, जिसमें भक्तों ने श्रद्धा और विश्वास के साथ विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित कर जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की.

सुबह से शाम तक चलेगा पूजा-अनुष्ठान का क्रम

मंदिर में पूजा व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुई. सुबह 7:30 बजे भगवान विष्णु की भव्य आरती की गई, जबकि दोपहर 12 बजे भोग अर्पित कर भगवान को शयन कक्ष में विश्राम के लिए ले जायेगा. इसके बाद दोपहर 1 बजे मंदिर का पट पुनः श्रद्धालुओं के लिए खोला जायेगा. शाम 6:30 बजे पापहारिणी सरोवर तट पर महाआरती का आयोजन होगा, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होंगे. इसके बाद भोग अर्पण के पश्चात रात 7:30 बजे मंदिर का पट बंद कर दिया जायेगा.

बृहस्पति पूजा और केले के पेड़ का धार्मिक महत्व

इस विशेष दिन विभिन्न स्थानों पर बृहस्पति देव की पूजा भी की गई. श्रद्धालुओं ने केले के पेड़ की पूजा कर भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना की. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है. भक्तों का विश्वास है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, रोगों से मुक्ति मिलती है और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है. मंदिर परिसर में यह परंपरा वर्षों से श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.

पुजारियों ने बताया परंपरा और आस्था का महत्व

पुजारी भुवनेश्वर झा, विभूति पाठक और लखन झा ने बताया कि अष्टकमल मंदिर में प्रतिदिन वैदिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. मंत्रोच्चारण और धार्मिक नियमों का पूर्ण पालन यहां की विशेष पहचान है. उन्होंने कहा कि यह स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी स्रोत है. मंदार क्षेत्र की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जो आज भी उतनी ही जीवंत और प्रभावशाली है.

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