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एकीकृत कृषि अपनाए, किसानों के आय में होगी वृद्धि, जोखिम होगा कम

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एकीकृत कृषि अपनाए, किसानों के आय में होगी वृद्धि, जोखिम होगा कम

कुटुंबा. भारतीय मूल में जब से कृषि का अविष्कार हुआ है, लोगो में संपन्नता आई है. इसके बाद से कृषि व पशुपालन का प्रचलन बढ़ा है. वर्तमान परिवेश में खेती से किसानों के आय दुगनी करने के लिए कृषि में नित्य नये-नये प्रयोग किए जा रहें है. मशीनीकरण के युग में परंपरागत खेती को अपेक्षा आधुनिक तकनीक से खेती की जा रही है. ऐसे में कृषको को कम लागत में अधिक उत्पादन का लाभ मिल रहा है. ये बातें बुधवार को प्रखंड परिसर में आयोजित खरीफ महाभियान सह किसान प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने कही. कार्यक्रम का उद्घाटन सहायक परियोजना आत्मा निदेशक भरत सिंह के साथ-साथ सहायक निदेशक मिट्टी जांच प्रयोगशाला राजीव रंजन यादव, केवीके के शस्य वैज्ञानिक डॉ पंकज सिंहा, मौसम वैज्ञानिक डॉ अनूप कुमार चौबे व आत्माध्यक्ष बृजकिशोर मेहता ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया. खरीफ महोत्सव का संचालन बीएओ कृष्णदेव चौधरी ने किया. अधिकारी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षो से औरंगाबाद जिला में सामान्य से कम बारिश होने के कारण धान एवं अन्य फसलों के उत्पादन करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. ऐसे में किसानों को पूर्व से ही सचेत कर फसल लगाने की जरूरत है. आत्मा के उप परियोजना निदेशक श्री सिंह ने कहा कि किसानों के पास अब भूमि सीमित रह गयी है. उन्हें एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाकर सीमित संसाधनो में आय की वृद्धि करनी होगी. इधर किसान कर क्या रहें हैं, कि कृषि से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध यूरिया का प्रयोग कर रहे हैं, जो कतई उचित नहीं है. इससे एक तरफ पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, दूसरे तरफ भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण हो रही है. उन्होंने कहा कि एकीकृत कृषि प्रणाली में गृहस्थी के सभी घटक फसल उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मवेशी पालन, फल फूल व सब्जी का उत्पादन, मुर्गी पालन, मछली पालन व वानिकी आदि को समेकित किया जाता है. एकीकृत प्रणाली को अपनाकर खेती के जोखिमों को कम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस प्रणाली से संग्रहित जल से फसल उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. जमीन के अनुसार प्रभेद का करें चयन केवीके सिरीस के शस्य वैज्ञानिक पंकज कुमार ने कहा कि किसानों को जमीन के अनुसार प्रभेद का चयन करना चाहिए. उन्होंने मोटे अनाज की खेती करने हेतु तकनीकी जानकारी किसानों को दी, जिससे कम पानी व उर्वरक की आवश्यकता होता है. साथ ही धान के फसल में पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग नियंत्रण के बारे मंल विस्तार पूर्वक जानकारी दी. कहा कि खरीफ फसल के लिए बीज मायने रखता है. उन्होंने नर्सरी की तैयारी से लेकर बिचड़ा गिराने व धान की रोपाई खर पतवार नियंत्रण कीट ब्याधि सिंचाई आदि के बारे में विस्तार से बताया. कहा कि नर्सरी में बिचड़ा जब 25 दिन का हो जाए तो उसे उखाड़कर कादो में एक पौधा लगाना चाहिए. इसी तरह से 30 दिन से अधिक के होने पर दो और 40 दिनों से अधिक के होने पर तीन पौधा की रोपाई की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि इधर असंतुलित मात्रा में यूरिया के प्रयोग करने से फसल में बीमारी व कीट व्याधि का भयंकर अटैक हो रहा है. आत्माध्यक्ष ने खरीफ महोत्सव में स्ट्रॉबेरी सेव व केला की खेती के बारे में बताया. मौसम का प्रतिकूल पड़ रहा प्रभाव मौसम वैज्ञानिक डॉ चौबे के कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इतना अधिक पड़ रहा है कि किसान अब तक धान का बिचड़ा तक नहीं डाल पाए हैं. धान के नर्सरी तैयार करते समय अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या इससे कम रहने पर बीज का अंकुरण अच्छा होता है. वैसै अच्छी खेती के लिए रोहिणी नक्षत्र को वरदान माना जाता है. रोहिणी नक्षत्र में लंबी अवधि वाले धान के प्रजातियों का नर्सरी में बीज डालना शुभ माना गया है. किसानों का भी मानना है कि इस नक्षत्र में बीज डालने से खेती आगे होती है. इसके पहले नक्षत्र के अनुसार मौसम में अनुकूल होता था. अब फसल पर मौसम का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हैं. उन्होंने किसानों को जलवायु आधारित खेती करने की नसीहत दी. मौके पर को-ऑर्डिनेटर परशुराम कुमार, संजीव कुमार योगेंद्र कुमार, सलाहकार मुरारी राम रमेश शर्मा, संजीव कुमार, आकाश कुमार, चितरंजन कुमार, रंजीत कुमार व दीपक कुमार आदि खेतिहर मौजूद थे.

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