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Home बिहार आरा संतान की दीर्धायु होने के लिए जिउतिया पर्व पर माताओं ने रखा निर्जला उपवास

संतान की दीर्धायु होने के लिए जिउतिया पर्व पर माताओं ने रखा निर्जला उपवास

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संतान की दीर्धायु होने के लिए जिउतिया पर्व पर माताओं ने रखा निर्जला उपवास

आरा.

जिले भर में जिउतिया का पर्व श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ माताओं में मनाया. इस दौरान सभी माताओं ने अपने पुत्रों के लिए दीर्घायु होने की कामना की व भगवान से इसका आशीर्वाद मांगा. निर्जला उपवास रखकर पुत्रवती माताओं ने पुत्रों की मंगल कामना की.

देर शाम पवित्र नदियों में किया स्नान किया दान पुण्य : देर शाम व्रती महिलाओं ने नदी घाटों पर पहुंचकर स्नान किया व दान पुण्य किया. हालांकि अधिकांश माताओं ने घरों में ही स्नान कर पूजा -पाठ किया. इसे लेकर पूरे जिले में भक्तिमय माहौल बना रहा.

माताओं ने सुनी जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा : स्नान के बाद महिलाओं ने अपने पूर्वजों को नमन किया और व्रत का अनुष्ठान किया. देर शाम समूहों तथा अपने घरों में व्रती महिलाओं ने मिष्ठान्न, पकवान, फल, फूल सजा कर चिल्हो शियारों की कथा सुनी. व्रती माताओं ने निर्जला उपवास रखकर भगवान जीउत वाहन की विधिवत पूजा-अर्चना की. कई स्थानों पर व्रतियों ने परंपरानुसार भगवान सूर्य को भी अर्घ अर्पित किया.

नेनुआ के पता पर धागे में सोने एवं चांदी की जिउतिया गुथाकर अरवा चावल के अक्षत लेकर पारंपरिक रीति रिवाज के साथ पूजा-अर्चना की. ऐसी मान्यता है कि व्रत रखनेवाली माताओं के पुत्र दीर्घजीवी होते हैं और उनके जीवन में आने वाली सारी विपत्तियां स्वत: टल जाती है. इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के अनुसार अश्विन कृष्णपक्ष अष्टमी को चिल्ही और सियारिन ने नियमानुसार व्रत रखा, पर कथा सुनने के दौरान सियारिन को भूख लग गयी और वह श्मशान में जाकर इच्छा भर मांस खा लिया. जबकि चिल्ही ने पूरे दिन व्रत रखकर नवमी तिथि को गोरस से पारण किया. अगले जन्म में चिल्ही और सियारिन काशी के एक व्यवसायी के यहां सगी बहन के रूप में पैदा हुई. बड़ी होने पर सियारिन की शादी काशी नरेश एवं चिल्ही का विवाह राजा के एक मंत्री से हुई.सियारिन के पुण्य प्रताप से उसे आठ तेजस्वी पुत्र हुए.जबकि रानी (सियारिन) के पुत्र पैदा होते ही मर जाते थे.ईर्ष्या वश रानी ने मंत्री के पुत्रों को मारने के लिए तरह-तरह के उपाय किये. पर मंत्री की पत्नी ने जीवित पुत्रिका के पुण्य बल से अपने बच्चों को बचा लिया.अंत में रानी मंत्री के घर पहुंची और मंत्री की पत्नी से पूछा कि बहन तुमने ऐसा क्या पुण्य किया है ,जिससे तुम्हारे बच्चे नहीं मरते. इस पर चिल्ही ने उसे सारा वृतांत सुनाकर जीवित पुत्रिका व्रत करने की सलाह दी.रानी ने भी विधानपूर्वक जीवित पुत्रिका व्रत किया.इसके बाद उसे कई पुत्र हुए.वे प्रतापी राजा हुए. इस कथा के अनुरूप कलियुग में भी माताओं द्वारा पुत्रों के दीर्घायु होने के लिए जीवित पुत्रिका व्रत किया जाने लगा.

पारण के साथ होगा व्रत का समापन : व्रत का रविवार को पारण किया गया.पारण के बाद माताओं द्वारा बनाए गए ठेकुआ लोगों को प्रसाद के रूप में दिया जाएगा.वही विशेष ठेकुआ ,जिसे कई जगहों पर ओठघन कहा जाता है,इसे पुत्रवती माताएं अपने पुत्रों को खिलाएंगी.

वहीं सहार प्रखंड क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी संतान के दीर्घाऊ एवं समृद्धि हेतु निर्जला उपवास रखा, जहां बुधवार की शाम में महिलाओं ने सोन नद,नहर, पोखर एवं घर पर स्नान कर पूजा-अर्चना किया. इस मौके पर सोन नदी में महिलाओं की काफी भीड़ देखी गयी. बता दें कि महिलाओं के द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास किया जाता है, जिससे कि संतान पर आनेवाली कष्ट के निवारण हो सके.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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