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Home बिहार आरा बहू का आदर बेटी की तरह करना चाहिए : जीयर स्वामी जी

बहू का आदर बेटी की तरह करना चाहिए : जीयर स्वामी जी

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बहू का आदर बेटी की तरह करना चाहिए : जीयर स्वामी जी
सांकेतिक तस्वीर

आरा.

परमानपुर चातुर्मास व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्रीलक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि आज समाज में सास और बहू के बीच सामंजस्य की कमी हो गयी है, जिसके कारण घर में कौतूहल होते रहता है. जिस प्रकार से माता अपनी बेटी का आदर करती है. पिता बेटी का आदर करते हैं. उसी प्रकार से बहू भी जब घर में आती है, तो उसका आदर सास और ससुर के द्वारा बेटी की तरह ही करना चाहिए.

कभी-कभी ऐसा होता है कि बेटी भी कुछ गलती कर देती है, लेकिन उस गलती को माता-पिता समाज में किसी से नहीं कहते हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि बेटी है थोड़ा बहुत गलती भी हो गयी है तो समाज में कहने से नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, लेकिन जब बहू थोड़ी सी भी गलती करती है, तो उसके गलती को आस पड़ोस में कहा जाने लगता है, ऐसा नहीं होना चाहिए. सास ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो बहू को सांस नहीं लेने दे. सास ऐसी होनी चाहिए जो बहू को बेटी की तरह आदर करती हो, लेकिन केवल सास ही बहू की आदर करें, तो भी काम बनने वाला नहीं है. बहू को भी माता-पिता की तरह सास-ससुर के मर्यादा का पालन करना चाहिए. जिस प्रकार से बेटी अपने माता-पिता की आदर करती है, उसी प्रकार से जब वह बेटी, बहू बनकर अपने ससुराल में आती है, तो उसे सास की आज्ञा को मनाना चाहिए. बहू भी ऐसी नहीं होनी चाहिए जो सास की सांस लेने पर पाबंदी लगाती हो. ऐसी बहू समाज के लिए बेहतर नहीं हो सकती है. समाज में आज एक नया चलन शुरू हो गया है. बहू ससुराल में सास से किसी बात की जानकारी कम लेती है. जबकि हर बात के लिए माता से ही सलाह अधिक लेती है, लेकिन ससुराल में बेहतर सामंजस्य स्थापित करने के लिए बहू को सास की विशेष सलाह लेने की आदत डालनी चाहिए. क्योंकि माता-पिता का घर जन्मभूमि होता है, लेकिन बेटी के विवाह के बाद उसकी संपूर्ण जीवन का कर्म भूमि ससुराल होता है. इसीलिए कर्मभूमि और कर्म का विशेष महत्व बताया गया है. इसलिए सास और बहू को अपनी गरिमा को समझते हुए समाज में बेहतर सामंजस्य को स्थापित करना चाहिए.

जिसकी जैसी भावना, भगवान उनके साथ उसी भावना से मिलते हैं

श्रीमद्भागवत कथा अंतर्गत गंगा के पावन तट पर शुकदेव जी राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराते समय कृष्ण भगवान का संक्षिप्त रूप में जीवन परिचय बता दिये. तब राजा परीक्षित शुकदेव जी से कहते हैं कि मुझे भगवान श्रीकृष्ण का संक्षिप्त परिचय नहीं पूरा वर्णन सुनाइए. जिस भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की रक्षा की, उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे की रक्षा की, उन श्रीकृष्ण का पूरा वंश परंपरा और उनके बारे में उनकी लीलाओं के बारे में बताइए. शुकदेव जी कहते हैं कि भगवान श्री कृष्णा भवरोगों के रामबाण औषधि हैं. भगवान श्रीकृष्णा साक्षात वेद हैं. भगवान सर्वज्ञाता हैं. ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण के साथ जितने भी गोप, गोपीकाएं, ग्वाल, गायएं थीं, वह सभी वेद और वेद की ऋचाएं और श्लोक थे. भगवान श्रीमननारायण से एक बार वेद और वेद की ऋचाओं, श्लोकों ने कहा कि हे भगवान हम आपके साथ रहना चाहते हैं. आपका गुणगान करना चाहते हैं. आपकी लीलाएं देखना चाहते हैं. तभी भगवान ने उन्हें कहा कि जब मैं कृष्ण अवतार लूंगा, तब आप लोग ब्रज की गोप, गोपीकाएं, ग्वाल, गाय, बछड़े बनेंगे. जिसकी जैसी भावना थी, भगवान उनके साथ उसी भावना से मिले, उनके साथ रहे. भगवान शंकर जी भी भगवान श्रीमन नारायण के साथ कृष्ण अवतार में रहना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने बहुत दिनों तक तपस्या की. वहीं भगवान श्री कृष्ण की जो बंसी थी, वह भगवान शंकर जी ही थे.ब्रह्मा जी ने भी भगवान श्री कृष्ण जी के साथ रहने, उनके लीला को देखने की इच्छा जाहिर की तो भगवान श्री कृष्ण के अवतार में उनके साथ छड़ी बनकर ब्रह्मा जी रहे. वही देवराज इंद्र, साधु, संत, महात्मा सभी लोगों ने भगवान की तपस्या करके उनके साथ रहने की इच्छा जाहिर की. वो सभी लोगों को कृष्ण अवतार में कुछ न कुछ बनकर भगवान श्री कृष्ण के साथ लीला किये. ब्रज में गाय, बछड़ा, गोप, गोपी, ग्वाल, बाल या जो भी कृष्ण अवतार में कृष्ण जी के साथ उनके लीला का दर्शन किए, वह सभी लोग देवी, देवता, संत, महात्मा ही थे.देवकी वासुदेव जी जो की बहुत दिनों से तपस्या कर रहे थे, उनको भगवान श्री कृष्ण ने अपने माता-पिता के रूप में चुना.एक बार पृथ्वी पर राक्षसों, दैत्य का अत्याचार बढ़ जाने के वजह से पृथ्वी माता दुखी हो गई थी.तब वह एक गाय का रूप लेकर ब्रह्मा जी के पास गई और उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि मुझ पर बहुत अत्याचार हो रहा है.मैं सबको रहने के लिए खाने के लिए हर चीज की व्यवस्था लोगों को देती हूं. लेकिन अगर इतना ही अत्याचार मेरे ऊपर होगा तो मेरी शक्ति खत्म हो जाएगी. तब ब्रह्मा जी शंकर भगवान और सभी देवता मिलकर भगवान श्रीमन नारायण के पास क्षीरसागर के तट पर गये.सभी देवता लोग भगवान श्रीमन नारायण की स्तुति किये.तब भगवान श्रीमन नारायण ने कहा कि मैं बहुत जल्द धरती पर मथुरा में जन्म लूंगा. जहां पर अत्याचारियों, राक्षसों, दैत्य, दुराचारियों का अंत करूंगा.धर्म की स्थापना करूंगा. साधु संतों, पृथ्वी सबकी रक्षा करूंगा.इसलिए आप लोग कुछ दिन धैर्य रखिए. ब्रज में मैं लीला करूंगा। इसलिए आप सभी लोग गोपी, ग्वाल, बाल, गाय, बछड़ा आदि बनकर के भी वहां मेरे साथ उस लीला में सहयोगी होंगे.वही मथुरा के राजा उग्रसेन और देवल दो भाई थे.उग्रसेन का पुत्र कंस था और देवल की पुत्री देवकी थी. वही देवकी का विवाह यदुवंश राजा सुरसेन के पुत्र वासुदेव जी से हुआ.जब वासुदेव जी और देवकी को कंस विवाह के बाद छोड़ने जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुआ कि कंस तुमने जिस देवकी को इतने खुश होकर छोड़ने जा रहे हो, उसके आठवें पुत्र से तुम्हारी मृत्यु होगी.जिसके बाद उसी समय कंस देवकी को मारने का कोशिश किया.तब वासुदेव जी ने समझा बूझकर उसे शांत किया.फिर देवकी वासुदेव को कंस ने कारागार में बंद कर दिया.जब भी उनके पुत्र या पुत्री होती, कंस उन्हें मार देता था.वही जब देवकी का सातवां गर्भ था तो उस समय गर्भ में शेषनाग अवतार लेकर आये थे.तब भगवान श्रीमन नारायण ने देवकी के गर्भ को वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित करवा दिए.देवकी के आठवें गर्भ से भगवान श्रीमन नारायण कृष्ण के रूप में जन्म लिए.तब सभी देवता भगवान कृष्ण का स्तुति करने लगे.वही जब भगवान श्री कृष्ण का कारागार में जन्म हुआ तो सभी कारागार के द्वारपाल सो गये.सभी कारागार के ताला खुल गया.वहीं वासुदेव जी ने भगवान श्री कृष्ण को ले जाकर गोकुल में नंद जी की पत्नी यशोदा जी के पास छोड़ दिए और यशोदा जी की पुत्री अपने साथ लेकर मथुरा में आ गये.

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