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Home बिहार अररिया ग्लोबल टेंडर से सड़क निर्माण में नये प्रयोग पर उठे सवाल, छोटे ठेकेदारों में नाराजगी

ग्लोबल टेंडर से सड़क निर्माण में नये प्रयोग पर उठे सवाल, छोटे ठेकेदारों में नाराजगी

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ग्लोबल टेंडर से सड़क निर्माण में नये प्रयोग पर उठे सवाल, छोटे ठेकेदारों में नाराजगी

गुणवत्ता व समयबद्धता को लेकर ग्रामीणों में चिंता

भरगामा. प्रखंड क्षेत्र में सड़क निर्माण को लेकर सरकार, ग्रामीण कार्य विभाग व पीएचईडी की ओर से इस बार एक नया प्रयोग किया गया है. विभाग ने स्थानीय ठेकेदारों को दरकिनार करते हुए सड़क निर्माण के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किया है. इसके तहत एक-एक ठेकेदार को 20 से 40 सड़कों का एक साथ टेंडर दिया गया है. हालांकि सरकार की इस नीति का उद्देश्य बड़े पैमाने पर कार्य को तेजी से संपन्न कराना बताया गया है. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ ओर ही कहानी बयां कर रही है.

इन ग्लोबल टेंडरधारी ठेकेदारों के पास न तो पर्याप्त मानव संसाधन हैं ना ही स्थानीय स्तर पर मौजूद मशीनरी या निगरानी तंत्र, जिससे निर्माण कार्य समय पर गुणवत्तापूर्ण तरीके से हो सके. परिणामस्वरूप कई योजनाओं पर काम अब तक शुरू नहीं हुआ है. जो शुरू हुआ है, वह भी धीमी गति व गुणवत्ता को लेकर सवालों के घेरे में है.

ग्रामीणों की उम्मीदों पर फिरा पानी

सड़क निर्माण को लेकर ग्रामीणों में जो उम्मीदें थीं. वह फिलहाल अधर में लटकती दिख रही हैं. गांवों में जहां बारिश के कारण कीचड़ व जर्जर सड़कों से परेशानी बढ़ी है. वहीं नये निर्माण की धीमी रफ्तार लोगों को निराश कर रही है.

ठेकेदारों ने उठाये सवाल, कहा-छोटे ठेकेदारों की हो रही अनदेखी

वर्षों से स्थानीय कार्य अनुभव रखने वाले दर्जनों ठेकेदार इस बार प्रक्रिया से बाहर कर दिये गये. बड़े ठेकेदार संसाधनों की कमी के कारण न समय पर काम कर पा रहे हैं व कार्य में गुणवत्ता ही सुनिश्चित नहीं हो रही है. ग्लोबल स्तर के ठेकेदारों के पास स्थानीय नेटवर्क का अभाव है, जिससे निगरानी कमजोर हुई है.

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हर साल सड़क बनने की बात होती है. लेकिन इस बार तो शुरुआत भी नहीं हुई. पहले छोटे ठेकेदार थे तो कम से कम काम समय पर शुरू होता था. स्थानीय ठेकेदारों को मौका नहीं दिया गया. ग्लोबल टेंडर से कोई ठेकेदार गांव में एक बार भी नहीं आये है. जनता को भरोसा नहीं रह गया है.

विजय भारती, संवेदक

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हमारे जैसे सैकड़ों लोगों को एक झटके में बाहर कर दिया गया, जबकि हम वर्षों से सड़क निर्माण में बेहतर काम कर रहे थे. यह नाइंसाफी है. सरकार का यह प्रयोग कितना सफल होगा, यह आने वाले समय में सड़क निर्माण की प्रगति व गुणवत्ता से तय होगा. लेकिन फिलहाल के हालात से यह स्पष्ट है कि छोटे ठेकेदारों की अनदेखी व बड़े ठेकेदारों की कार्यक्षमता की सीमाएं ग्रामीण विकास की राह में बाधा बनती दिख रही हैं. यदि सरकार समय रहते निगरानी तंत्र को सशक्त नहीं करती, तो जनता का विश्वास व संसाधन दोनों संकट में पड़ सकते हैं.

रविंद्र कुमार यादव, संवेदक

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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