खामोश रणनीति, पक्की जीत: बिहार राज्यसभा चुनाव में बीजेपी का सधा खेल

Advocate Rakesh Kumar Singh: बिहार राज्यसभा चुनाव में BJP ने चतुर और सधी रणनीति अपनाई. विधानसभा में स्पष्ट गणित के बावजूद असली चुनौती वोटों को संभालकर रखना थी. क्रॉस-वोटिंग कम रही, लेकिन विपक्ष को उम्मीद के अनुसार बढ़त नहीं मिली. बाहर से शांत दिखने वाली प्रक्रिया के भीतर सियासी चाल बेहद सूझ-बूझ वाली थी.

By Prabhat Khabar Digital Desk | March 17, 2026 5:57 PM

Advocate Rakesh Kumar Singh: बिहार की राजनीति कभी सीधी नहीं रही. यहां जो दिखता है, वो होता नहीं और जो होता है, वो अक्सर दिखता नहीं. सोमवार को राज्यसभा की 6 सीटों के लिए हुई वोटिंग भी कुछ ऐसी ही रही. बाहर से सब कुछ शांत, सामान्य, लेकिन भीतर एक बेहद बारीक और सुलझी हुई सियासी चाल चली जा रही थी. 243 सदस्यीय विधानसभा का गणित कागज पर साफ था. हर उम्मीदवार को जीतने के लिए करीब 35-36 वोट चाहिए थे. देखने वाले कह सकते थे कि सत्ता पक्ष को अपनी सीटें मिलेंगी, विपक्ष को अपनी और बात खत्म. लेकिन राज्यसभा की राजनीति उतनी सरल कभी नहीं होती जितनी दिखती है.

जब गिनती में सब ठीक हो, तब भी चूक हो जाती है

यहां असल चुनौती संख्या जुटाना नहीं बल्कि उसे संभालकर रखना था. राज्यसभा चुनावों में खुलकर विद्रोह कम होता है, लेकिन खामोश दूरी बहुत होती है. कोई विधायक दिख रहा है, हां भी कह रहा है, लेकिन वोट कहां पड़ा यह बात मतपेटी खुलने तक किसी को नहीं पता चलती. इस बार बड़े पैमाने पर क्रॉस-वोटिंग सामने नहीं आई, यह सच है. लेकिन विपक्ष जिस अतिरिक्त बढ़त के साथ मैदान में उतरा था वह उसे नहीं मिली.

बीजेपी ने इसे “रूटीन” नहीं माना -यही फर्क पड़ा

पिछले कई दिनों से दोनों खेमों में बैठकें हो रही थीं. लेकिन एक खेमे ने इसे महज़ औपचारिकता की तरह निपटाया वहीं बीजेपी ने अपने विधायकों के साथ-साथ सहयोगी दलों तक लगातार संपर्क बनाए रखा. कोई गलतफहमी नहीं, कोई असमंजस नहीं. जिस किसी के मन में कोई सवाल था, उसे वहीं सुलझाया गया. यह काम शोर मचाकर नहीं, चुपचाप और धैर्य से हुआ और इसीलिए इसका असर भी दिखा.

कहां चूक गया विपक्ष?

विपक्ष से जो गलती हुई, वो नई नहीं थी. गठबंधन की संख्या को देखकर यह मान लिया गया कि सब ठीक है. जबकि बिहार की राजनीति में सब ठीक है यह मानना ही सबसे बड़ी भूल होती है. अंदरखाने नाराजगियां थीं किसी को टिकट का इंतज़ार था, किसी को भविष्य की चिंता. ये सब सुगबुगाहटें थीं, लेकिन विपक्ष उन्हें एक सुलझी हुई रणनीति में नहीं बदल पाया. जब आप उन आवाज़ों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो वे खामोशी से दूसरी तरफ चली जाती हैं.

ना ढील, ना घमंड — यही थी बीजेपी की असली ताकत

बीजेपी ने इस पूरे चुनाव को एक मिशन की तरह लड़ा. ना कोई लापरवाही, ना यह सोचकर बैठना कि हमारे तो इतने विधायक हैं, क्या होगा. हर वोट को गंभीरता से लिया गया. हर विधायक से बात हुई. हर सहयोगी के साथ रिश्ता ताजा रखा गया. जब विपक्ष संभावनाओं का हिसाब लगा रहा था, तब बीजेपी नतीजों को तय कर रही थी. यही फर्क आखिर में दिखा.

बिहार की राजनीति यही सिखाती है कि सिर्फ नंबर होना काफी नहीं, उन नंबरों को आखिरी वक्त तक थामे रहना भी एक कला है. इस बार बीजेपी ने वह कला एक बार फिर साबित की. अपनी जीत तो पक्की की ही, साथ में विपक्ष की उम्मीदों पर भी चुपचाप एक बड़ी रोक लगा दी.

एडवोकेट राकेश कुमार सिंह चेयरमैन- भारत उत्थान संघ, खाना चाहिए फाउंडेशन, महाराणा प्रताप फाउंडेशन