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Home Religion 132वीं जयंती: परमहंस योगानंद को भीड़ नहीं, ईश्वर के सच्चे भक्तों की थी तलाश

132वीं जयंती: परमहंस योगानंद को भीड़ नहीं, ईश्वर के सच्चे भक्तों की थी तलाश

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132वीं जयंती: परमहंस योगानंद को भीड़ नहीं, ईश्वर के सच्चे भक्तों की थी तलाश
परमहंस योगानंद

-सच्चिदानंद वर्मा-

Paramahansa Yogananda 132nd birth anniversary : पूरे विश्व को क्रिया योग से परिचय कराने वाले भारतीय योगी परमहंस योगानंद को आज हर वो व्यक्ति जानता है, जो ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा रखता है. इस भारतीय योगी को पश्चिमी देशों में तब ख्याति मिली जब 1920 में अमेरिका के बोस्टन में आयोजित धार्मिक उदारवादियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने संबोधित किया. उनके उद्बोधन से लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्हें विभिन्न समूहों द्वारा आध्यात्मिक व्याख्यान देने के निमंत्रण मिलने लगे.अमेरिका के विभिन्न शहरों में आयोजित होने वाले परमहंस योगानंद के व्याख्यान सुनने के लिए इतने लोग आ जाते थे कि हॉल में खड़े होने के लिए जगह तक नहीं बचता था. लेकिन उनकी नजर उन लोगों की तलाश में रहती थी जिन्हें ईश्वर के प्रति प्रेम हो, चाहत हो. बाद के वर्षों में उन्होंने माउंट वाशिंगटन में सेल्फ रिलाइजेशन फेलोशिप नामक सेंटर खोला और वहीं सत्संग करने लगे. एक मौके पर उन्होंने कहा था कि ‘मुझे भीड़ नहीं बल्कि ईश्वर का भक्त चाहिए.’ आगे चल कर परमहंस योगानंद ने अनेक लोगों के ईश्वर के साक्षात्कार की चाहत को अपने क्रिया योग की दीक्षा द्वारा पूरा किया. आज भी ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक लोग भारत के योगदा आश्रम व सेंटरों व विदेशों में स्थापित किये सेल्फ रिलाइजेशन सेंटरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और अपनी ईश मिलन की प्यास को संतृप्त कर रहे हैं.

छोटी मां तुम्हारा पुत्र एक योगी बनेगा

परमहंस योगानंद जी का जन्म 5 जनवरी, 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में एक धर्म-परायण व समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था. माता-पिता ने उनका नाम मुकुंद लाल घोष रखा. उनके सगे-संबंधियों को यह स्पष्ट दिखता था कि बचपन से ही उनकी चेतना की गहराई एवं आध्यात्म का अनुभव साधारण से कहीं अधिक था. योगानंद के माता-पिता प्रसिद्ध गुरु लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, जिन्होंने आधुनिक भारत में क्रियायोग के पुनरुत्थान में प्रमुख भूमिका निभायी थी. जब योगानंदजी अपनी मां की गोद में ही थे, तब लाहिड़ी महाशय ने उन्हें आशीर्वाद दिया था और भविष्यवाणी की थी- छोटी मां, तुम्हारा पुत्र एक योगी बनेगा. एक आध्यात्मिक इंजन की भांति, वह कई आत्माओं को ईश्वर के साम्राज्य में ले जायेगा. अपनी युवावस्था में मुकुंद ने एक ईश्वर-प्राप्त गुरु को पाने की आशा से भारत के कई साधु-संतों से भेंट की.

गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि से दीक्षा प्राप्त की

सन् 1910 में 17 वर्ष की आयु में वे स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि के शिष्य बने. इस महान गुरु के आश्रम में उन्होंने अपने जीवन के अगले दस वर्ष बिताये और उनसे कठोर परंतु प्रेमपूर्ण आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की. पहली भेंट पर ही और उसके पश्चात कई बार श्रीयुक्तेश्वर ने अपने युवा शिष्य को बताया कि उसे ही प्राचीन क्रियायोग के विज्ञान को अमेरिका तथा पूरे विश्व भर में प्रसार करने के लिए चुना गया था. मुकुंद द्वारा कोलकाता विश्वविद्यालय से सन् 1915 में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उनके गुरु ने उन्हें गरिमामय संन्यास परंपरा के अनुसार संन्यास की दीक्षा दी और तब उन्हें योगानंद नाम दिया गया (जिसका अर्थ दिव्य योग के द्वारा परमानंद की प्राप्ति).

रांची स्कूल में ध्यान के दौरान हुआ दिव्य अनुभव

योगानंद ने 1917 में लड़कों के लिए एक ‘आदर्श जीवन’ विद्यालय की स्थापना के साथ अपना जीवन कार्य आरंभ किया. इस स्कूल में आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ योग एवं आध्यात्मिक आदर्शों में प्रशिक्षण भी दिया जाता था. कासिमबाजार के महाराजा ने विद्यालय को चलाने के लिए रांची (कोलकाता से लगभग 250 मील दूर) में स्थित अपना ग्रीष्मकालीन महल उपलब्ध कराया था. कुछ साल बाद स्कूल को देखने आये महात्मा गांधी ने लिखा- “इस संस्था ने मेरे मन को गहराई से प्रभावित किया है.”
सन् 1920 में एक दिन रांची स्कूल में ध्यान करते हुए योगानंद को एक दिव्य अनुभव हुआ, जिससे उन्होंने समझा कि अब पश्चिम में उनका कार्य आरंभ करने का समय आ गया है. वे तुरंत कोलकाता के लिए रवाना हो गये, जहां अगले दिन उन्हें बोस्टन में उस साल आयोजित होने वाले धार्मिक नेताओं के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए निमंत्रण मिल गया. श्रीयुक्तेश्वर ने योगानंद के इस संकल्प की पुष्टि करते हुए कहा कि वह सही समय था, और आगे कहा- “सभी दरवाजे तुम्हारे लिए खुले हैं. अभी नहीं तो कभी नहीं जा सकोगे.”

पश्चिम में भारत के प्राचीन ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया

सन् 1925 की शुरुआत में लॉस एंजिलिस पहुंचकर उन्होंने माउंट वाशिंगटन के ऊपर सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय की स्थापना की,जो आगे चल कर उनके बढ़ते काम का आध्यात्मिक और प्रशासनिक केंद्र बन गया. जगद्गुरु परमहंस योगानंद को पश्चिम में भारत के प्राचीन ज्ञान के सबसे महान् प्रचारक के रूप में पहचाना जा रहा है. उनका जीवन और शिक्षाएं सभी जातियों, संस्कृतियों और पंथों के लोगों के लिए प्रकाश और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं. वर्ष 1946 में उन्होंने अपनी जीवनी ‘योगी कथामृत’ का प्रकाशन किया था.
1999 में इस पुस्तक को ‘शताब्दी की 100 सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक पुस्तकों’ में से एक कह कर सम्मानित किया गया. इस पुस्तक के प्रति रुचि में निरंतर वृद्धि के कारण इसे पंद्रह प्रमुख भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषाओं में एवं दुनिया भर की 50 से अधिक भाषाओं में अनुदित एवं प्रकाशित किया गया है.

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योगानंद जी के दैवीय शक्ति के भी कई किस्से

वैसे तो परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में अमेरिका में शुरुआती वर्षों में होने वाली परेशानियों, कष्टों, संघर्षों व कठिनाइयों का जिक्र नहीं किया है, न ही कहीं अपने द्वारा किये गये दैविक चमत्करों का वर्णन किया है. लेकिन अमेरिकन वेदा के लेखक फिलिप गोल्डबर्ग ने ‘द लाइफ एंड टाइम्स आफ योगानंदा’ नामक पुस्तक में परमहंस योगानंद के संघर्षों का जिक्र किया है. इसके अनुसार, अमेरिकन प्रेस के रवैये, स्वामी धीरानंद तथा एक अन्य द्वारा दिया गया धोखा व टूर कोआर्डिनेटर मोहम्मद राशिद के साथ संबंध आदि कई कड़ुवे अनुभव का सामना योगानंद को करना पड़ा था. उनके द्वारा किये गये चमत्कारों का वर्णन भी कुछ पुस्तकों में मिलता है. परमहंस योगानंद के भारत आगमन पर उनके बंगाली भाषा के सचिव रहे स्वामी सत्यानंद गिरी ने भी उनकी जीवनी में जिक्र किया है कि कैसे योगानंद ने बेंगलुरु में एक सेमिनार हॉल में एक लंगड़े को ठीक कर दिया था. योगानंद के छोटे भाई सनंदलाल घोष ने भी ‘मेजदा’ नामक एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने जिक्र किया है कि कार में पेट्रोल समाप्त हो जाने के बावजूद भी उन्होंने रांची से जमशेदपुर की यात्रा पूरी की थी.

भारतीय योग से पूरे विश्व को परिचय कराया

परमहंस योगानंद 20वीं सदी के एक महान आध्यात्मिक गुरू, योगी और संत थे, जिन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग उपदेश दिया तथा पूरे विश्व में उसका प्रचार-प्रसार किया. योगानंद प्रथम भारतीय गुरु थे, जिन्होंने अपने जीवन के कार्य को पश्चिम में किया. 7 मार्च, 1952 को उन्होंने महासमाधि ले ली. भारत सरकार इस महान संत के नाम पर दो बार डाक टिकट जारी कर चुकी है. आज पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय विश्व योग दिवस और विश्व ध्यान दिवस मनाया जाता है. इसमें योगानंद के योगदान को हम कभी भूला नहीं सकते. भारत के इस संत ने भारतीय योग से पूरे विश्व को परिचय जो कराया था.

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