Krishnapingala Sankashti Chaturthi: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है. इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत किया जाता है. मान्यता है कि यह व्रत जीवन के संकटों को दूर करने और संतान सुख की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी होता है. पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताते हुए माहिष्मति नगरी के राजा महीजित की कथा सुनाई थी. आइए जानते हैं इस व्रत से जुड़ी यह प्रेरणादायक कथा.
पौराणिक कथा

जब प्रजा राजा के दुख का समाधान खोजने जंगल पहुंची
पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में माहिष्मति नगरी पर राजा महीजित का शासन था. राजा बहुत ही प्रतापी, धार्मिक और प्रजावत्सल थे. अपनी प्रजा को वे संतान के समान स्नेह देते थे, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ी कमी थी- उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था.
समय बीतने के साथ जब राजा की आयु बढ़ने लगी, तो उनकी चिंता भी और भी बढने लगी. एक दिन उन्होंने अपनी प्रजा और विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर कहा, “मैंने जीवन में कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया. प्रजा को हमेशा अपनी संतान के समान माना, फिर भी मुझे संतान सुख क्यों नहीं मिला?” राजा का दुख देखकर प्रजा और ब्राह्मणों ने इसका उपाय खोजने का निश्चय किया. समाधान की तलाश में वे एक दल बनाकर घने जंगल की ओर निकल पड़े.
महर्षि लोमश ने बताया संतान प्राप्ति का उपाय
जंगल में भटकते हुए उनकी भेंट त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश से हुई, जो तपस्या में लीन थे. सभी ने उन्हें प्रणाम कर राजा महीजित की व्यथा सुनाई और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा. प्रजा की निष्ठा देखकर महर्षि लोमश ने कहा, “आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप का विधि-विधान से पूजन और संकष्टी चतुर्थी का व्रत करें. राजा श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखें तथा ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्र का दान दें. भगवान गणेश की कृपा से उन्हें शीघ्र ही संतान सुख की प्राप्ति होगी.”
व्रत के प्रभाव से महल में गूंजी किलकारी
महर्षि लोमश का उपदेश सुनकर प्रजा प्रसन्न होकर नगर लौट आई और राजा महीजित को पूरी बात बताई. राजा ने श्रद्धा और नियमपूर्वक आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी का व्रत रखा. उन्होंने भगवान गणेश की पूजा की, ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान-दक्षिणा दी. मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुछ समय बाद रानी सुदक्षिणा गर्भवती हुईं और उन्होंने एक सुंदर, भाग्यशाली तथा सर्वगुण संपन्न पुत्र को जन्म दिया. तभी से कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत संतान सुख और संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है.
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