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इच्छाओं की अनंतता

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इच्छा पर अनुशासन की बात बहुत सुखद है, क्योंकि आज सारा संसार इच्छाओं का दास बना हुआ है. इच्छाओं की दासता स्वीकार करने का जो परिणाम आ रहा है, वह किसी से अज्ञात नहीं है. इसलिए हर समझदार व्यक्ति चाहेगा कि मैं अपनी इच्छाओं को अनुशासित कर लूं.
इच्छाओं पर अनुशासन के सामने सबसे बड़ी विभीषिका है- इच्छाओं की अनंतता. जिस प्रकार आकाश का कोई छोर नहीं है, उसी प्रकार इच्छाओं की कोई सीमा नहीं है. वामन व्यक्ति उद्बाहु होने पर भी ऊंचे वृक्ष पर लगे फल को तोड़ नहीं सकता. कोई भी व्यक्ति भुजाओं में आकाश को बांध नहीं सकता. इसी प्रकार अनंत इच्छाओं का नियमन नहीं हो सकता. जो नहीं हो सकता, उस असंभव काम में हाथ डालना बुद्धिमत्ता नहीं है. इच्छाएं अनंत हैं, यह बात जितनी सही है, उतनी ही सही यह बात भी है कि व्यक्ति में इच्छाओं के निरोध की शक्ति भी अनंत है. हमने इच्छाओं को पकड़ लिया और निरोध की क्षमता को उपेक्षित कर दिया.
यह अधूरी समझ है. यह अधूरी समझ ही व्यक्ति को भटकाती है. मनुष्य जब तक अपने भीतर निहित क्षमताओं से परिचित नहीं होता है, वह बड़ा काम नहीं कर सकता. युद्ध के मैदान में सेनाएं खड़ी हैं. जनबल और शस्त्रबल के प्रबल होने पर भी वह सेना हार जाती है, जिसमें आत्मबल नहीं होता. रावण की बहुरूपिणी विद्या राम और लक्ष्मण के वाणों की बौछार के सामने टिक नहीं सकी. क्योंकि आत्मबल के अभाव में विद्या का बल व्यर्थ हो जाता है.
– आचार्य तुलसी
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