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गुरु की दृष्टि पड़ने से बनता है विवाह का योग

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गुरु की दृष्टि पड़ने से बनता है विवाह का योग

रांची : प्रभात खबर कार्यालय में गलवार को ऑनलाइन ज्योतिष काउंसलिंग का आयोजन किया गया. ज्योतिषी डॉ आरके तिवारी ने पाठकों के सवालों के जवाब दिये. उन्होंने बताया कि सूर्य से पिता, आत्मा, प्रताप, आरोग्य, आसक्ति व लक्ष्मी का विचार होता है.

चंद्रमा से मन, बुद्धि, राजा की प्रसन्नता, माता और धन का विचार होता है. मंगल से पराक्रम, रोग, गुण, भाई, शत्रु और जाति का विचार होता है. बुध से विद्या, विवेक, मामा, मित्र और वचन का विचार होता है. उसी प्रकार से वृहस्पति से बुद्धि, शरीर, पुष्टि, पुत्र और ज्ञान का विचार होता है.

शुक्र से स्त्री, भूषण, कामदेव, व्यापार की ओर सुख का विचार होता है. शनि से आयु, जीवन, विपत्ति और संपत्ति का विचार किया जाता है. राहु से पितामह का विचार होता है. द्वादश भाव का कारक ग्रह सूर्य लग्न भाव का, वृहस्पति धन का, मंगल सहज का, चंद्र और बुध शुभ का, वृहस्पति पुत्र का, शनि और मंगल शत्रु का, शुक्र जाया का, शनि मृत्यु का, सूर्य और वृहस्पति धर्म का, सूर्य बुध और शनि कर्म का, वृहस्पति लाभ और शनि व्यय भाव के कारक ग्रह होते हैं.
विवाह संबंधी विषय पर उन्होंने बताया कि किसी भी जातक के विवाह के कारक ग्रह गुरु और शुक्र हैं. किसी भी कुंडली में जब गुरु की पांचवीं, सातवीं और नौवीं दृष्टि लग्न पर या सप्तम भाव पर पड़ती है, तब विवाह का योग बनता है. लेकिन अगर गुरु वक्रीय हो या कुंडली में मांगलिक दोष हो या कुंडली में सप्तम भाव में शनि, सूर्य, राहु, मंगल, केतु ग्रह हो, तो कुंडली दूषित होती है. इससे वैवाहिक सुख में कमी, विलंब से विवाह तथा विवाह के उपरांत भी कलह पूर्ण जीवन व्यतीत होता है.

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