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अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से होती है रोगों की उत्पत्ति

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अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से होती है रोगों की उत्पत्ति
पं आशीष तिवारी, ज्योतिषाचार्य
ज्यो तिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. मानसिक बीमारी होने के बहुत-से कारण होते हैं. ज्योतिष के अनुसार, किसी भी जातक की जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होनेवाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है. मानसिक बीमारी में कुंडली में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है. चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है. जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है.
सेजोफ्रेनिया रोग में चतुर्थभाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है. शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं. मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होता है. जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनती है, क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है और चंद्रमा मन है. मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं. व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है. यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है और ये तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं तब व्यक्ति में अत्यधिक जिदपन हो सकती है और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है.
जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है.
जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है. कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है. शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है.
जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है. राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है.
ज्योतिषीय उपाय : उपरोक्त स्थितियों का कुंडली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से रोग से बचा जा सकता है. ज्योतिष में रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बतायी गयी है. अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा-पाठ, मंत्र-जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन शास्त्र में उल्लेखित हैं.
इसके अलावा कुछ सहज उपाय हैं –
पीपल पेड़ पर रविवार को छोड़कर हर दिन जल चढ़ाएं. पुरुष सात बार इसकी परिक्रमा करें. महिलाएं न करें.
हर पूर्णिमा पर भोलेनाथ को जल चढ़ाएं.
अमावस्या को प्रात: मेहंदी का दीपक पानी मिलाकर बनाएं. महामृत्युजंय मंत्र की एक माला जपें.
चौमुंहा दीपक बनाकर उसमें 7 उड़द दाने, सिंदूर, 2 बूंद दही डाल कर एक नीबू की दो फांकें शिवजी पर चढ़ाएं .
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