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पितृ पक्ष: महाभारत काल में प्रसिद्ध हुई धर्मारण्य वेदी

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पितृ पक्ष: महाभारत काल में प्रसिद्ध हुई धर्मारण्य वेदी

डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’

यह गाैरव की बात है कि प्राचीन जय संहिता (महाभारत) में गया विषयक विवरण स्पष्ट रूप से मिलता है आैर यह भी स्पष्ट है कि गया की दर्जनाें पिंडवेदियां महाभारत काल में ही स्थापित व चर्चित हुईं. इन पिंड प्रदान स्थलाें में ‘धर्मारण्य’ सर्वप्रमुख है, जहां पांडव बंधुआें ने चातुर्मास यज्ञ विधिवत संपन्न किया था. धर्मारण्य का ‘रहट कूप’ उसी जमाने से गया प्रसिद्ध है. गया के अक्षयवट की पुण्य प्रसिद्धि भी महाभारत काल में द्विगुणित हुई ताे मां मंगलागाैरी मार्ग में भीमगया वेदी इसी युग में सर्वख्यात हुई है.

विवरण है महाबलि भीम यहीं पिंडार्पित कर रहे थे, तब उनके भार से पाषाण खंड में घुटने का अंकन हाे गया. गया तीर्थ के उत्तर व दक्षिण की पंचवेदियाें में गण्य काकबलि तीर्थ की महत्ता में श्रीवृष्टि महाभारत काल में ही हुई, ताे आम्र सिंचन वेदी (मंगलागाैरी के पुरातन मार्ग में) का उद्धार भी महाभारत काल में हुआ है. बाेधगया व गया के मध्य विराजमान सरस्वती तीर्थ में पंचरत्न दान का जाे विधान आज भी बरकरार है, उसकी शुभ शुरुआत महाभारत काल में ही हुई है. अक्षयवट के पार्श्व में विराजमान रुक्मिणी सराेवर इसी जमाने में चर्चा में आया. यहां अाज भी श्राद्ध पिंडदान का सिर्फ पितृपक्ष बल्कि वर्ष भर हाेता है. यह पुत्र प्राप्ति केंद्र के रूप में पूरे मगध में चर्चित है.

श्री विष्णुपद के 16 वेदियां का छह वेदी महाभारतकालीन हैं, जिसे मध्यकाल में व्यवस्थित किया गया. गदालाेल वेदी की प्रसिद्धि भी महाभारत काल में बढ़ी, जब यहां युधिष्ठिर ने तर्पण किया था.

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