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Home Religion ”नानक नाम जहाज है, चढ़ै सो उतरे पार”

”नानक नाम जहाज है, चढ़ै सो उतरे पार”

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”नानक नाम जहाज है, चढ़ै सो उतरे पार”
गुरविंदर सिंह सेठी
सन 1469 ई में लाहौर के ननकाना साहिब (वर्तमान पाकिस्तान में) में पिता मेहता कालू और माता तृप्ता (मेहता कल्याणदास जी और माता तृप्ता जी) के घर में गुरु नानक देव जी का प्रकाश हुआ. इस विलक्षण बालक के जन्म लेते ही चारों ओर एक अद्भुत नूर फैल गया.
सतगुरु नानक परगटिया
मिटी धुंध जग चानण होआ
सिख-धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी के आगमन के समय देश जटिल समस्याओं से घिरा था. समाज में अंधविश्वासों, कर्मकांडों एवं बाह्य आडंबरों का बोलबाला था. समय की आवश्यकता को भांप कर ही उन्होंने 15वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में सिख-धर्म की नींव डाली.
तत्कालीन समाज में व्याप्त हर अन्याय के खिलाफ वे डट कर खड़े रहे. न सिर्फ अपने संदेशों और सिद्धांतों को प्रतिपादित किया, बल्कि व्यावहारिक रूप में अपने उपदेशों पर चल कर लोगों को प्रेरित किया. संसार के भवसागर में श्री गुरुनानक जी के उपदेश एक जहाज की तरह हैं, जो हमें डूबने से बचा सकते हैं-
नानक नाम जहाज है, चढ़ै सो उतरे पार।
महान रचना : मनुष्यता को सत्यमार्ग पर चलने की प्रेरणा देने हेतू उन्होंने अपनी महान रचना ‘जपु जी’ का सृजन किया, जिसकी शुरुआत एक ईश्वर पर आधारित मूल मंत्र से होती है- इक्क ओन्कार सत नाम: करता पुरख: निरभऊ निरवैर: अकाल मूरत: अजूनी सैभं: गुर प्रसाद ॥
अर्थात- ईश्वर एक है. वह सत्य है. वह सृष्टिकर्ता है. उसे किसी का डर नहीं. उसका कोई स्वरूप नहीं. वह पैदा नहीं होता. उसे गुरु द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है.
हुक्मे अंदर सबको, बाहर हुकूम न कोय।
यह संसार ईश्वर के हुकूम (आदेश) का खेल है. उसी के आदेश से सब संचालित होता है. सांसारिक जीवन में झूठ के पर्दे मेंसच को छिपाया जा सकता है, परंतु ईश्वर के दरबार में कर्मों के आधार पर न्याय होता है.
स्त्री सम्मान : उस घोर नारी निंदक युग में स्त्री सम्मान की रक्षा में गुरु जी ने कहा- ”सो क्यों मंदा अखिये, जित जम्मे राजान”. अर्थात- उसे क्यों बुरा कहें, जो बड़े-बड़े राजाओं, महापुरुषों आदि को जन्म देती है, जो सृष्टि की जननी है.
(लेखक झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग, रांची के उपाध्यक्ष हैं)
तीन मुख्य सिद्धांत
गुरु जी के जीवन के तीन मुख्य सिद्धांत थे –
नाम जपना : सच्चे मन से ईश्वर की स्तुति करना ही नाम जपना कहलाता है.
किरत करना : मेहनत एवं ईमानदारी की कमाई करने को ही किरत करनी का दर्जा दिया गया है.
वंड छकना : दीन-दुखियों की सहायता करना, बांट कर खाना ही वंड छकना है.
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