[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Religion वासंतिक नवरात्र सातवां दिन : जानें कैसे प्रसन्‍न करें मां कालरात्रि देवी को

वासंतिक नवरात्र सातवां दिन : जानें कैसे प्रसन्‍न करें मां कालरात्रि देवी को

0
वासंतिक नवरात्र सातवां दिन : जानें कैसे प्रसन्‍न करें मां कालरात्रि देवी को

जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.

त्वं देवि जननी परा-7

वेदोपनिषद् पुराणेतिहासादि ग्रन्थों में सर्वत्र देवी की अखंड और अपार महिमा का विवरण-वर्णन पाया जाता है, जिससे स्पष्ट होता है कि शक्ति सृष्टि की मूल नाड़ी, चेतना प्रवाह और सर्वव्यापी है. शक्ति की उपासना आज की उपासना नहीं है, वह अत्यंत प्राचीन, बल्कि अनादि है. वह एक महाशक्ति ही परमात्मा हैं, जो विभिन्न रूपों में विविध लीलाएं करती हैं. परमात्मा के पुरुष वाचक सभी स्वरूप इन्हीं अनादि, परमेश्वरी आद्या महाशक्तिके ही हैं.

ये ही महाशक्ति अपनी मायाशक्ति को जब अपने अंदर छिपाये रखती हैं, उससे कोई क्रिया नहीं करतीं, तब निष्क्रिय, शुद्ध ब्रह्म कहलाती हैं. ये ही जब उसे विकासोन्मुख करके एक से अनेक होने का संकल्प करती है, तब स्वयं ही पुरुष रूप से मानो अपनी ही प्रकृतिरूप योनि में संकल्प द्वारा चेतन रूप बीज स्थापन करके सगुण, निराकार परमात्मा बन जाती है. श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।

हे अर्जुन,मेरी महत् ब्रह्म अर्थात अष्टधा मूल प्रकृति संपूर्ण भूतों की योनि है और उसमें मैं चेतन रूपी बीज को स्थापित करता हूं, उस जड़-चेतन के संयोग से सभी भूतों की उत्पत्ति होती है.

चेतन परमात्मरूपिणी महाशक्ति के बिना जड़ प्रकृति से यह सारा कार्य कदापि संपन्न नहीं हो सकता. इस प्रकार महाशक्ति विश्व रूप विराट पुरुष बनती हैं और इस सृष्टि के निर्माण में स्थूल निर्माणकर्ता प्रजापति के रूप में आप ही अंशावतार के भाव से ब्रह्मा और पालनकर्ता के रूप में विष्णु और संहारकर्ता के रूप में रुद्र बन जाती है. ये ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि अंशावतार भी किसी कल्प में दुर्गारूप से होते हैं,

(क्रमशः) प्रस्तुतिःडॉ.एन.के.बेरा.

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel