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Home Religion विशेष लेख: भटक रहे हैं युवा, माता सरस्वती की पूजा पश्चिमी सभ्यता में हो रही है तब्दील

विशेष लेख: भटक रहे हैं युवा, माता सरस्वती की पूजा पश्चिमी सभ्यता में हो रही है तब्दील

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विशेष लेख: भटक रहे हैं युवा, माता सरस्वती की पूजा पश्चिमी सभ्यता में हो रही है तब्दील

संजय सागर

कला व संस्कृति की प्रतीक विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के लिए खास त्यौहार है. पूजा बसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है. इसे माघ महीने के बसंत पंचमी के दिन हर स्कूल कॉलेजों एवं गली मोहल्लों में मनाया जाता है.

यह पूजा पूरे भारत में धूमधाम के साथ मनाया जाता है माता सरस्वती को स्थापित कर भक्तगण पूजा करते हैं प्रथम दिन बुंदिया मिठाई के साथ साथ मटर गाजर बेर का प्रसाद चढ़ाया जाता है जबकि दूसरे दिन खिचड़ी का प्रसाद माता सरस्वती के लिए भोग लगाया जाता है माता सरस्वती की पूजा सादगी पूजा है. लेकिन यह पूजा सादगी ना रहा कर तामझाम वाला पर्व बना दिया गया है.

भारत की संस्कृति रही है देवियों की पूजा सादगी के साथ मनाना पहले माता सरस्वती की मूर्ति को स्थापित कर सादगी पूर्वक पूजा-पाठ कर के लोक भजन आरती गीत प्रस्तुत करते थे विसर्जन के दौरान साइकिल वृक्षों एवं ट्रैक्टरों में झांकी स्थापित कर माता सरस्वती के नारे के साथ नदियों और तालाबों तक पहुंचते थे लेकिन सरस्वती पूजा मनाने की संस्कृति अब धीरे-धीरे पश्चिमी संस्कृति का रूप ले लिया है अब अधिकांश युवा वर्ग सरसती पूजा को डिस्को डांस के रूप में मनाते हैं.

पारंपरिक ढोल के जगह डीजे साउंड

पहले सरस्वती पूजा पारंपरिक ढोल के साथ की जाति थी। लेकिन अब अधिकांश पूजा पंडालों में डीजे साउंड के साथ पूजा अर्चना किये जाते हैं. पूजा के बाद भजन गीत की जगह फिल्मी गाने बजने लगे हैं. कई स्थानों में सरस्वती पूजा को लेकर आर्केस्ट्रा का आयोजन किये जाते हैं. भक्ति गीतों के स्थान पर नाच-गान किये जाने लगे हैं. इस तरह के आयोजन किये जाने से विद्यार्थी एवं युवा वर्ग में आदर्श खोता जा रहा है. विसर्जन के दौरान ताशा पार्टियों के जगह डीजे साउंड का उपयोग किया जाता है. विसर्जन के दौरान पहले माता सरस्वती के कई नारे के साथ लोग नदियों, तालाबों व अन्य जलाशयों के पास पहुंचकर माता सरस्वती की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता था. लेकिन अब जिस तरह से युवा वर्ग भटक गये हैं ,उसे यह दिखाई देने लगा है कि अब वह परंपरा का पतन होने लगा है. विसर्जन के दौरान ताशा पार्टी की जगह डीजे साउंड विभिन्न तरह के फिल्मी गीत बजाए जाते हैं और उन गीतों की धुन के साथ युवा वर्ग नाचते- गाते जाते हैं. विसर्जन का शोभायात्रा अब जुलूस के रूप में ले लिया है और यह जुलूस देर रात तक निकलता रहता है. कहीं-कहीं तो दो दिनों तक जुलूस निकाला जाता है ।इस दौरान कई युवकों को शराब के नशे में देखा जाता है.

चार हाथों वाली माता सरस्वती कई संदेश देती है
माता सरस्वती कमल के फूल एवं हंस पर विराजमान रहती है. इसलिए इन्हें हंस वाहणी भी कहा जाता है. माता सरस्वती के हाथों में पुस्तक व वीणा है क्योंकि माता सरस्वती ज्ञान की देवी के साथ साथ संगीत कला की भी देवी है. इससे हमें ज्ञान के साथ-साथ कला व संस्कृति काफी प्रेरणा मिलता है. माता सरस्वती को शारदा मां भी कहा जाता है. इनकी वस्त्र श्वेतांबर या सादा है. सितंबर या सादा रंग स्वच्छ विचार का प्रतीक है. इससे हमें प्रेरणा मिलता है कि हम सभी मानव को स्वच्छ विचार रखना चाहिए और सादगी पूर्वक रहना चाहिए. माता सरस्वती 4 हाथ वाली मां है जो हमें यह प्रेरणा देती है कि हमें चारों दिशाओं के क्षेत्र में ध्यान रखना चाहिए एवं प्रतिभा शील प्रतिभा रहना चाहिए. सरस्वती माता को पसंद कमल फूल है. कमल का फूल कीचड़ में खिलता है। जो हमें संदेश देता है कि जिस तरह से कमल कीचड़ में खिलता है. ठीक उसी प्रकार से हमें विपरित परिस्थितियों या दुख में घबराना नहीं चाहिए. बल्कि हमें हर विपत्तियों को सामना करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए. माता सरस्वती हंस या मोर में सवार रहती है। हंस व मोर मधुर वाणी का प्रतीक है ।जिससे हमें यह प्रेरणा मिलता है कि हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए.

युवा वर्ग ना भटके

हमें माता सरस्वती की पूजा सादगी पूर्वक एवं धूमधाम के साथ मनाना चाहिए. पारंपरिक ढोल -नगाड़े के साथ पूजा -पाठ करनी चाहिए. फिल्मी गीत के जगह भजन गीत गाने चाहिए. साउंड में भजन गीत ही लगाना चाहिए. विसर्जन के लिए शोभा यात्रा करना चाहिए. ना की भव्य जुलूस के रूप में डीजे साउंड के साथ फिल्मी गाने की धुन पर डांस करना चाहिए. हमें इसके जगह माता सरस्वती के नाम विभिन्न तरह के नारें लगाते जाना चाहिए. तालियों के साथ झूमते हुए जाना चाहिए। धूम्रपान का सेवन नहीं करना चाहिए.

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