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आस्‍था का महापर्व छठ, आज नहाय-खाय, ऐसे करें छठी माई की पूजा

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आस्‍था का महापर्व छठ, आज नहाय-खाय, ऐसे करें छठी माई की पूजा
पहला दिन : नहाय-खाय
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. घर की सफाई के बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बना शुद्ध भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं.
छठ माहात्म्य
द्रौपदी ने रखा था व्रत : इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं. छठ के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था.
खास खगोलीय अवसर : लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है. लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी. छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है. षष्ठी तिथि (छठ) एक खास खगोलीय अवसर है.
सामाजिक समरसता : इस पर्व में सफाई का बहुत अधिक महत्व है. पूजा में प्राकृतिक वस्तुओं और उनसे बने सामान का उपयोग किया जाता है. एक ही घाट पर विभिन्न जाति के लोग इकट्ठा होते हैं, जिससे सामाजिक समरसता भी बढ़ती है.
पराबैंगनी किरणों से बचाव: छठ पर्व के समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं. उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है.
कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जानेवाला पर्व है छठ. यह लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड व पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है. हिंदुओं द्वारा मनाये जानेवाले इस पर्व को अन्य धर्मावलंबी भी मनाते हैं. पिछले एक दशक में धीरे-धीरे इस त्योहार का विस्तार हुआ है. यह पर्व प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्व भर में प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है. चार दिवसीय इस व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है. इसलिए इसे छठ व्रत कहते हैं.
छठ पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जानेवाले पर्व को कातिकी छठ कहते हैं.
प्रकृति पर्व
सूर्य यानी ‘आदिदेव सूर्य ‘ की धरती के सकल प्राणी को अत्यंत आवश्यकता है. धरती सूखे, वातावरण उष्मा से भरा हो, प्रकाशित हो अग-जग. सूर्य जीवन है, सूर्य ही जल के स्रोत को राह देता है. इस मौके पर यह संकल्प लेना सही होगा कि हम विलुप्त होती उद्भिज, फल -फूल -मूल -कंद को प्रयोग में लाने के लिए उसका संरक्षण करें. अपनी मांग से नाक तक रासायनिक प्रयोगशाला में निर्मित सिंदूर न लगाकर प्राकृतिक सिंदूर लगाएं.
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