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पलायन का दंश झेलता बोकारो का चतरोचट्टी, 3 महीने में ताबूत में लौटे 5 प्रवासी श्रमिक

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पलायन का दंश झेलता बोकारो का चतरोचट्टी, 3 महीने में ताबूत में लौटे 5 प्रवासी श्रमिक
चतरोचट्टी झेल रहा है पलायन का दंश. फोटो : नागेश्वर

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Brunt of Migration: झारखंड की राजधानी रांची से करीब 100 किलोमीटर दूर है चतरोचट्टी. यह बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड में आता है. आदिवासी बहुल इलाका है. बेरोजगारी बड़ी समस्या है. इसलिए चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं. कोई देश के किसी अन्य राज्य में जाकर काम करने लगता है, तो कोई विदेश का रुख कर लेता है.

कई बार लोग विदेश जाकर कबूतरबाजों के चंगुल में फंस जाते हैं, तो कई बार किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं. कई बार तो नौबत ऐसी होती है कि परिवार के पास शव लाने तक के पैसे नहीं होते. सरकार की मदद से उनके शव को लाया जाता है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी कमाने गये लोग ताबूत में लौटते हैं.

महाराष्ट्र में 19 साल के रवि की हो गयी मौत

ताजा मामला गोमिया प्रखंड के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के चतरोचट्टी पंचायत का है. 19 साल का रवि कमाने के लिए मुंबई गया था. वहां सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया. अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. उसकी मां अब इस दुनिया में अकेली रह गयी, क्योंकि पिता की 8 साल पहले वज्रपात से मौत हो गयी थी. 3 बहनें हैं, तीनों की शादी हो चुकी है. बूढ़ी मां का अपने इकलौते बेटे रवि के लिए रो-रोकर बरा हाल है. आसपास के लोग, पड़ोस की महिलाएं उसे काफी समझाते हैं, लेकिन जब भी वह अकेली होती है, बेटे की याद में उसकी आंखों अश्रुधारा बहने लगती है.

Brunt Of Migration
कोरोना संकट के दौरान इस तरह सिर और कंधे पर सामान उठाकर हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव जाने के लिए निकल पड़े थे प्रवासी श्रमिक.

हर साल सैकड़ों लोग करते हैं गांव से पलायन

रवि की मां इकलौती नहीं, जिसके घर का चिराग बुझ गया. चतरोचट्टी थाना क्षेत्र की बात करें, तो महज 3 महीने में 5 प्रवासी श्रमिकों की मौत हो चुकी है. परदेस में मरने वाले इन 5 प्रवासी श्रमिकों में 4 चुटे पंचायत के रहने वाले थे. चतरोचट्टी पंचायत के एक प्रवासी श्रमिक की महाराष्ट्र में मौत हो गयी. क्षेत्र से हर साल बोकारो जिले के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र से सैकड़ों लोग पलायन करते हैं. इनमें से कई लोगों की मौत हो जाती है.

  • 3 महीने में चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के 5 लोगों की मौत
  • चुटे पंचायत के 4 प्रवासी मजदूरों की हो गयी मौत
  • चतरोचट्टी पंचायत के मंगरो गांव निवासी रवि की मौत

चुटे और चतरोचट्टी पंचायत के इन 5 लोगों की हुई मौत

  • रजडेरवा गांव से रशिका मांझी
  • दंडरा गांव के महाबीर मांझी
  • खर्चाबेडा के दिलीप हंसदा
  • जमुआ बेड़ा गांव के करमा बास्के
  • मंगरो गांव के रवि कुमार

गोमिया में धान की अच्छी-खासी खेती होती है

गोमिया प्रखंड के वरिष्ठ पत्रकार नागेश्वर कहते हैं कि गोमिया प्रखंड में धान की अच्छी-खासी खेती होती है, लेकिन इससे जीवन स्तर में सुधार नहीं आता. बच्चों को पढ़ाने से लेकर बीमार लोगों का इलाज कराने तक के लिए पैसे की जरूरत होती है. इसलिए पलायन लोगों की मजबूरी है. वह कहते हैं कि क्षेत्र में सरकार की तरफ से मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के अलावा ऐसी कोई योजना नहीं चलायी जाती, जिससे लोगों को रोजगार मिल सके. वे पैसे कमा सकें.

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Brunt of Migration: कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र था चतरोचट्टी

वह कहते हैं कि झुमड़ा पहाड़ के पास स्थित आदिवासी बहुल यह इलाका कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र हुआ करता था. अब नक्सलवाद नहीं रहा. बावजूद इसके विकास की किरण यहां नहीं पहुंची. मनरेगा योजना में काम करने वालों को समय पर पैसे नहीं मिलते. मनरेगा के अधिकारी हों या कर्मचारी, किसी को समय पर पैसे नहीं मिलते. 2-3 महीने बाद पारिश्रमिक का भुगतान होता है. इससे मनरेगा श्रमिक परेशान रहते हैं और पलायन करते हैं.

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देश के कोने-कोने में रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड पर अपने घर लौटने के लिए लगी थी प्रवासियों की लंबी कतार.

नकद कमाने के लिए लोग शहर की ओर कर रहे पलायन

नागेश्वर कहते हैं कि शहरों में जाकर लोग नकद पैसा कमाना शुरू कर देते हैं. काम करने के तुरंत बाद उन्हें पैसे मिल जाते हैं. इसलिए कोई मनरेगा में काम भी नहीं करना चाहता. उन्होंने बताया कि कैमरून में फंसे झारखंड के जो 17 प्रवासी श्रमिक हाल ही में स्वदेश लौटे हैं, उसमें 7 गोमिया प्रखंड के ही रहने वाले हैं.

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2023 में हुआ था झारखंड माइग्रेशन सर्वे

वर्ष 2020 में कोरोनावायरस ने जब पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी थी, तब बड़ी संख्या में झारखंड के प्रवासी श्रमिक अपने लौटे थे. सरकार ने केरला माइग्रेशन सर्वे मॉडल के तहत झारखंड माइग्रेशन सर्वे करवाया था. वर्ष 2023 में जनवरी से मार्च तक सभी जिलों के 10,674 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया. इससे पता चला कि झारखंड के 45 लाख लोग आजीविका के लिए देश-दुनिया के अलग-अलग कोने में गये हैं. वर्ष 2023 के इसी सर्वे से पता चला कि 2,549 करोड़ रुपए इन प्रवासी श्रमिकों ने झारखंड भेजे.

5.11 लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक लौटे थे झारखंड

इससे पहले वर्ष 2020 में जब प्रवासी श्रमिक झारखंड लौटे थे, तो सरकार ने उनका एक डेटाबेस तैयार किया था. कराबी 7 लाख लोग लौटे थे. इनमें से 5,11,663 लोगों को प्रवासी श्रमिकों के रूप में चिह्नित किया गया था. इनमें से 3 लाख श्रमिकों की स्किल मैपिंग ग्रामीण विकास विभाग ने करवायी थी. 3 लाख में से 2.09 लाख कुशल और 92 हजार से अधिक लोग अकुशल श्रमिक थे.

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झारखंड सरकार ने कहा था- अपने ही राज्य में देंगे रोजगार

सरकार ने तब कहा था कि झारखंड लौटे प्रवासी श्रमिकों को अब राज्य में ही सरकार रोजगार देगी. उन्हें कमाने के लिए बाहर नहीं जाना होगा. इसके लिए बाकायदा उनकी स्किल मैपिंग की गयी थी. कौशल विकास मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) ने 2.70 लाख से अधिक कुशल श्रमिकों की सूची तैयार की थी. उसे उद्योग विभाग ने विभिन्न उद्योगों और औद्योगिक संगठनों को भेज दिया. हालांकि, इनमें से कितने लोगों को झारखंड में नौकरी मिली, इसकी जानकारी कभी सार्वजनिक नहीं की गयी.

अन्य राज्यों से लौटे थे 30 फीसदी अकुशल प्रवासी श्रमिक

झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने 2.5 लाख प्रवासी श्रमिकों की स्किल मैपिंग की थी. विभाग ने बताया था कि इनमें से 30 फीसदी यानी कम से कम 75 हजार लोग अकुशल श्रमिक हैं. पलायन रोकने के लिए राज्य सरकार का लक्ष्य इन लोगों को घर में ही रोजगार उपलब्ध कराना है.

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कोरोना संकट के दौरान इस तरह झारखंड लौटे थे प्रवासी श्रमिक.

कमाई के पारंपरिक स्रोतों को छोड़ पलायन कर रहे लोग

15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आये झारखंड राज्य की आबादी वर्ष 2011 की जनगणना में 3.29 करोड़ थी. वर्ष 2023 में यह बढ़कर 4 करोड़ से अधिक हो गयी. वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, झारखंड की कुल आबादी में 26.2 फीसदी लोग आदिवासी समाज से आते हैं. राज्य में 34 जनजातियां निवास करतीं हैं. सदियों से इनकी आजीविका जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहीं हैं, लेकिन अब इन्हें पैसे कमाने के लिए अपने पारंपरिक कमाई के स्रोतों को छोड़कर शहरों में पलायन करना पड़ रहा है.

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प्रवासी श्रमिकों को झारखंड सरकार देती है मदद

मृत्यु या पूर्ण दिव्यांगता की स्थिति में

  • 1,50,000 रुपए प्रवासी श्रमिक की मृत्यु या पूरी तरह से अपंग होने की स्थिति में पंजीकृत श्रमिक के आश्रित को सरकार देती है.
  • 1,00,000 रुपए प्रवासी श्रमिक की मृत्यु या पूरी तरह से अपंग होने की स्थिति में अपंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार.

दोनों आंखें या दो अंगों के नुकसान पर

  • 1,50,0000 रुपए पंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार
  • 1,00,000 रुपए अपंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार

एक आंख या एक अंग के नुकसान पर

  • 75,000 रुपए मिलते हैं पंजीकृत प्रवासी श्रमिकों के आश्रित को
  • 50,000 रुपए मिलते हैं अपंजीकृत प्रवासी श्रमिकों के आश्रित को

राष्ट्रीय आपदा में मृत्यु या पूरी तरह दिव्यांग होने की स्थिति में

  • पंजीकृत श्रमिक : किसी भी राज्य से पंजीकृत श्रमिक के पैतृक गांव तक शव लाने की पूरी व्यवस्था सरकार करेगी.
  • अपंजीकृत श्रमिक : किसी भी राज्य से अपंजीकृत श्रमिक के पैतृक गांव तक शव लाने की पूरी व्यवस्था सरकार करेगी.

लाभ लेने की पात्रता

  • प्रवासी श्रमिक को झारखंड का नागरिक होना चाहिए.
  • श्रमिक की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए.
  • झारखंड राज्य के बाहर काम करने के दौरान दुर्घटना में मृत्यु या अपंगता हुई हो.
  • श्रमिक अकुशल या अर्द्ध-कुशल श्रमिक का काम करता हो.
  • श्रमिक को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का होना चाहिए.

प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए जरूरी दस्तावेज

  • झारखंड की नागरिकता का प्रमाण पत्र (आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र इत्यादि)
  • रोजगार का प्रमाण या झारखंड से बाहर जाने का सबूत
  • आवेदन का पहचान पत्र
  • आय प्रमाण पत्र या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का होने का सबूत
  • प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए बैंक अकाउंट का डिटेल, ताकि पैसा खाते में ट्रांसफर किया जा सके

आवेदन की ऑफलाइन प्रक्रिया

  • आवेदक को कार्यालय समय (10 बजे से 5 बजे के बीच) जिला श्रम कार्यालय जाना होगा. वहां जाकर जिला श्रम पदाधिकारी से आवेदन का फॉर्म लेना होगा. उस फॉर्म को भरना होगा.
  • आवेदन पत्र में जितनी जानकारी मांगी गयी है, सारी जानकारी भरें. उसके साथ सभी जरूरी दस्तावेज (सेल्फ अटेस्टेड) अटैच करें.
  • आवेदन पत्र पर जमा करके जिला श्रम कार्यालय में जमा करें.
  • जिला श्रम कार्यालय में जहां आवेदन जमा कर रहे हैं, वहां से पावती रसीद जरूर ले लें. यह भी सुनिश्चित करें कि पावती रसीद पर तारीख और समय जरूर लिखा हो. संभव हो, तो आवेदन जमा लेने वाले का पहचान नंबर भी ले लें.

प्रवासी श्रमिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया

  • सबसे पहले श्रमाधान (Shramadhan) की ऑफिशियल वेबसाइट पर जायें.
  • आधार नंबर, पूरा नाम, माता या पिता का नाम, आवासीय पता, कार्यस्थल का पता, योग्यता, स्किल डिटेल और जन्म तिथि जैसी व्यक्तिगत जानकारियां डालें.
  • ड्रॉपडान से उस कैटेगरी को चुनें, जिसमें आप आते हैं और वहां अपना मोबाइल नंबर भरें.
  • अब अपना बैंक अकाउंट नंबर, बैंक का आईएफएससी कोड और अपने नॉमिनी (आश्रित) का नाम डालें. आपके साथ किसी अनहोनी की स्थिति में नॉमिनी के खाते में ही पैसे ट्रांसफर किये जायेंगे.
  • चेकबॉक्स को सेलेक्ट करें, इस बात की स्वीकारोक्ति दें कि आप अपना आधार डिटेल यूआईडीएआई (UIDAI) के साथ वेरिफिकेशन के लिए शेयर कर रहे हैं. भारत सरकार और झारखंड सरकार के पास भी आपकी ये सूचनाएं चली जायेंगीं.
  • अब सबमिट का बटन दबा दें.

नोट : प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए किसी भी घटना-दुर्घटना की सूचना तत्काल पास के सरकारी कार्यालय में देना जरूरी है. मसलन, प्रखंड विकास पदाधिकारी, श्रम अधीक्षक या जिला मजिस्ट्रेट, जो भी कार्यालय आपके सबसे समीप हो.

क्या कहते हैं गोमिया प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी?

Mahadev Kumar Mahto

चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के चुटे ओर चतरोचट्टी पंचायत में प्रवासी मजदूरों के निबंधन के लिए कैंप लगाकर निबंधन किया गया है, ताकि किसी प्रकार की आकस्मिक घटना होने पर श्रम विभाग से मिलने वाला मुआवजा उसके आश्रित को दिलवायी जा सके. रही बात क्षेत्र में रोजगार की, तो नरेगा से विभिन्न योजनाएं चलायी जा रहीं हैं. पंचायत में भी योजनाएं संचालित होती हैं. क्षेत्र के कुछ लोग खासकर टावरलाइन में काम करने वाले अधिक पैसे की लालच में अन्य राज्यों में या विदेश कमाने चले जाते हैं. –महादेव कुमार महतो, बीडीओ, गोमिया प्रखंड, बोकारो

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मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.
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