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New BooK: खादी की पहचान पर संकट

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New BooK: खादी की पहचान पर संकट

New BooK: भारत के पूर्व महानिदेशक (सीएजी) पी. शेष कुमार सार्वजनिक वित्त और ऑडिटिंग पर लगातार लेखन और विमर्श करते रहे हैं. उनकी हाल ही में आयी पुस्तक अनफोल्डेड की सीरिज, Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?(अनफोल्डेड: भारत के एमएसएमई और स्टार्टअप तंत्र की समस्याएं) भारतीय उद्यमशीलता तंत्र की गहन पड़ताल करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक है. यह नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और उद्यमियों के लिए समान रूप से उपयोगी है. पुस्तक स्पष्ट संदेश देती है कि भारत में उद्यमशीलता की क्षमता बहुत बड़ी है, लेकिन उसे वास्तविक परिणामों में बदलने के लिए प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और प्रभावी नीतिगत समर्थन आवश्यक है. 

पुस्तक के लेखक पी. शेष कुमार एमएसएमई के संयुक्त सचिव भी रहे हैं इसलिए वे एमएसएमई क्षेत्र में आने वाली संभावनाओं और चुनौतियों से भी भली भांति परिचित है. उन्होंने खादी ग्रामोद्योग कमीशन(केवीआईसी) के कामकाज पर सवाल उठाए हैं. पुस्तक में उन्होंने खादी की “पहचान के संकट”, नकली खादी के बढ़ते चलन, भ्रामक आंकड़ों और लगातार बढ़ती सब्सिडी निर्भरता का विस्तृत विश्लेषण किया है. लेखक के मुताबिक कानूनी तौर पर “खादी” वह कपड़ा है जो भारत में प्राकृतिक रेशों (कपास, रेशम या ऊन) से हाथ से काता और हाथ से बुना जाता है तथा जिसे खादी एंड विलेज इंडस्ट्री कमीशन(केवीआईसी) प्रमाणित करता है. लेकिन व्यवहार में “खादी” एक ऐसा ब्रांड बन गया है जिसकी बाजार में व्यापक नकल की जा रही है. लेखक बताते हैं कि असली और नकली खादी की पहचान धागे की बनावट से की जा सकती है.

असली खादी के धागों की मोटाई में स्वाभाविक असमानता होती है और ताना-बाना के धागों का मरोड़ अक्सर अलग-अलग दिशाओं में होता है. इसके विपरीत मिल या पावरलूम से बने कपड़ों में धागे एक समान और मशीन से कसे हुए होते हैं. पुस्तक में दावा किया गया है कि बाजार में बिकने वाली “खादी” का बड़ा हिस्सा वास्तव में पावरलूम या मिल में बना कपड़ा है. कुछ मामलों में तो आधिकारिक खादी दुकानों पर भी गैर-हस्तनिर्मित कपड़े बिकने के आरोप सामने आए हैं. इससे न केवल उपभोक्ताओं को धोखा मिलता है बल्कि वास्तविक कारीगरों की आजीविका पर भी असर पड़ता है.

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सब्सिडी के जाल में फंसा क्षेत्र


लेखक ने केवीआईसी  द्वारा पेश किए जाने वाले बिक्री और रोजगार के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि संसदीय रिपोर्टों में एक वर्ष रिकॉर्ड बिक्री दिखाई गई, जबकि अगले वर्ष अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई. इसी तरह रोजगार सृजन के दावे भी काफी उतार-चढ़ाव वाले बताए गए हैं. ऑडिट के दौरान पाया गया कि कई बिक्री केंद्र कागजों पर सक्रिय थे, जबकि वास्तव में वह बंद पड़े थे. आधार से जोड़ने के बाद हजारों “फर्जी कारीगरों” को रिकॉर्ड से हटाया गया, जिससे पिछली सब्सिडी में अनियमितताओं का खुलासा हुआ. खादी क्षेत्र धीरे-धीरे सरकारी सब्सिडी पर स्थायी रूप से निर्भर हो गया है. उत्पादन और बिक्री में गिरावट के बावजूद सरकारी खर्च बढ़ता गया है. सरकारी दुकानों का घाटा पूरा करने के लिए लगातार सब्सिडी दी जाती रही है. उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास भी रोजगार संरक्षण की राजनीति में उलझ गए. उदाहरण के तौर पर मल्टी-स्पिंडल चरखे जैसी आधुनिक तकनीक से उत्पादन बढ़ा, लेकिन इससे रोजगार घटने की आशंका के कारण सुधार की प्रक्रिया रुक गयी. 


केआरडीपी सुधार योजना की विफलता

पुस्तक में बताया गया है कि वर्ष 2009 में एशियन डेवलपमेंट बैंक के सहयोग से शुरू की गयी खादी रिफार्म एंड डेवलपमेंट प्रोग्राम(केआरडीपी) का उद्देश्य खादी क्षेत्र का आधुनिकीकरण, संस्थागत पारदर्शिता और आत्मनिर्भरता बढ़ाना था. इसके तहत डिजिटल प्रबंधन प्रणाली (केआईएमआईएस) और सीधे बैंक भुगतान जैसी पहलें शुरू की गयी. लेकिन संस्थागत प्रतिरोध और अक्षमता के कारण उपलब्ध 150 मिलियन डॉलर की बड़ी राशि का उपयोग ही नहीं हो पाया. सुधारों की गति धीमी पड़ गई और योजना अपेक्षित परिणाम देने में असफल रही. पुस्तक यह सवाल उठाती है कि क्या खादी अपने गांधीवादी आदर्शों से दूर होकर केवल ब्रांड प्रबंधन और सब्सिडी पर निर्भर एक ढांचे में बदल गई है? लेखक का निष्कर्ष है कि जब तक पारदर्शिता, प्रमाणित आंकड़े और वास्तविक सुधार नहीं होंगे, तब तक खादी क्षेत्र की समस्याएं बनी रहेगी. निश्चित रूप से यह पुस्तक एमएसएमई और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की नीतिगत कमजोरियों पर व्यापक बहस को आमंत्रित करती है और सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर देती है.

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