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Home Prabhat Literature भगवान वैद्य ‘प्रखर’ और हरीश कुमार ’अमित’ को ममता कालिया ने प्रदान किया आर्य स्मृति साहित्य सम्मान

भगवान वैद्य ‘प्रखर’ और हरीश कुमार ’अमित’ को ममता कालिया ने प्रदान किया आर्य स्मृति साहित्य सम्मान

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भगवान वैद्य ‘प्रखर’ और हरीश कुमार ’अमित’ को ममता कालिया ने प्रदान किया आर्य स्मृति साहित्य सम्मान


नयी दिल्ली :
वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने 16 दिसंबर को हिंदी भवन में आयोजित सम्मान समारोह में 25वें आर्य स्मृति साहित्य सम्मान से भगवान वैद्य ‘प्रखर’ और हरीश कुमार ’अमित’ को उनकी लघुकथाओं के लिए सम्मानित किया. इस सम्मान में दोनों साहित्यकारों ग्यारह- ग्यारह हजार रुपए और उनकी पुस्तकों की पचास-पचास प्रतियां भी भेंट की गयीं.

इस अवसर पर ममता कालिया ने कहा, लघुकथा एक रिलीफ का काम करती है. मैं पत्रिकाओं में सबसे पहले लघुकथा और कविता ही पढ़ती हूं. लेकिन लघुकथा को फिलर न बनाया जाये. किताबघर प्रकाशन ने अपने रजत जयंती वर्ष में इस विधा को समर्पित यह आयोजन कर एक बड़ा काम किया है. मुझे लगता है कि लघुकथा लिखते समय, किसी लोकोक्ति या सुनी हुई रचना की झलक न मिले. लघुकथा की शक्ति है उसकी तीक्ष्णता. उसमें अपूर्णता नहीं नजर आनी चहिए. लघुकथा कहानी की हाइकू है.

कार्यक्रम में सबसे पहले किताबघर के संस्थापक जगतराम आर्य को श्रद्धांजलि दी गयी. स्वागत भाषण में किताबघर प्रकाशन के निदेशक सत्यव्रत ने कहा कि प्रति वर्ष 16 दिसंबर को हम यह आयोजन किताबघर के संस्थापक जगतराम आर्य की स्मृति में करते हैं. हर बार एक नयी विधा पर प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. इसके विजेता को सम्मानित किया जाता है. इस बार लघुकथा की पांडुलिपियां आमंत्रित की गई थीं. इसके लिए हमारे निर्णायक मंडल के सदस्य थे असगर वजाहत, सुदर्शन वशिष्ठ और लक्ष्मीशंकर वाजपेयी. हमें खुशी है कि इस आयोजन में पांडुलिपियों की हाफ सेंचुरी पूरी हो गई. इनमें से दो आज पुस्तक रूप में लोकार्पित भी होंगी और उनके रचनाकार पुरस्कृत भी होंगे.

सम्मान अर्पण के बाद ‘लघुकथा की प्रासंगिकता’ पर एक परिसंवाद भी हुआ जिसकी शुरुआत की गोष्ठी के संचालक कथाकार महेश दर्पण ने. उन्होंने लघुकथा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय की चाल देखते हुए इस विधा का भविष्य उज्ज्वल है.

इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार प्रदीप पंत ने कहा, लघुकथा बहुत पहले से लिखी जा रही है. मैंने पहली लघुकथा पढ़ी थी यशपाल जी की ’मजहब’. कमलेश्वर जी ने इस विधा की शक्ति को पहचाना और लघुकथा पर दो- दो विशेषांक प्रकाशित किए. इस विधा में करुणा और गहरा व्यंग्य बड़ा काम करते हैं. किंतु लघुकथाकारों को चर्चित कहानियों के संक्षेपण से बचना चाहिए.

वरिष्ठ लघुकथाकार बलराम अग्रवाल का कहना था कि लघुकथा का काम है अपने समय की पहचान. किसी घटना को लघुकथा कैसे बनाया जा सकता है, यह बड़े कथाकरों से ही सीखा जा सकता है. उन्होंने सीरिया की एक लघुकथा की बानगी भी पेश की. याद दिलाया कि ’उल्लास’ के लिए पहले भी किताबघर प्रकाशन ने चैतन्य त्रिवेदी को सम्मानित किया था.

लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा, अपने समय में मैंने लघुकथाएं नेशनल चैनल से नियमित प्रसारित कीं. वे खूब सुनी जाती थीं. मेरी पहली ही रचना 1975 में एक दैनिक में लघुकथा ‘के रूप में प्रकाशित हुई थी. कुछ लघुकथाएं कमलेश्वर जी ने सारिका में प्रकाशित की थीं. आज का जैसा वीभत्स और डरा देने वाला माहौल है, उसमें साहित्य ही दिशा दे सकता है. मूल्यों से भले ही सत्ता और राजनीति अलग हो जाएं, साहित्य कभी अलग नहीं होता. लघुकथा यह काम बड़ी शिद्दत से कर रही है. वाजपेयी जी ने दोनों पुरस्कार विजेताओं की लघुकथाओं के उदाहरण सामने रखकर कहा कि अच्छी रचनाएं हमेशा याद रहती हैं.

वहीं इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने दोनों सम्मानित रचनाकारों को बधाई दी और कहा : एक समय तारिका के जरिए महाराज कृष्ण ने लघुकथा के लिए बड़ा योगदान किया. गुलेरी जी ने भी एक समय लघुकथाएं लिखी थीं. लघुकथा को उन्होंने सूक्ष्म, सूत्र रूप में काम करने वाली और बड़ी मारक विधा बताया. उनका कहना था कि लघुकथा लिखनेवाला बड़ा रचनाकार होता है.

कार्यक्रम में सम्मानित लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया और लघुकथा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. ‘प्रखर’ जी ने कहा कि लेखक की मुट्ठी में समय का कोई टुकड़ा आ जाता है. वही उसे सृजन के लिए मजबूर करता है. मैं भी सारिका में प्रकाशित हुआ था. यह मेरा दूसरा लघुकथा संग्रह है. उन्होंने अपनी रचना ‘पेट’ का पाठ किया. हरीश कुमार ‘अमित’ ने किताबघर प्रकाशन का आभार ज्ञापित किया. बताया कि यह उनका पहला लघुकथा संग्रह है. मेरी यह प्रिय विधा है. इस विधा में अन्य विधाओं का प्रभाव भी आ रहा है. उन्होंने अपनी लघुकथा ‘अपने अपने संस्कार’ का पाठ किया.

समारोह में वरिष्ठ लेखक गंगाप्रसाद विमल, कथाकर विवेकानंद, कवि राजेंद्र उपध्याय, कथाकार हीरालाल नागर, नाटककार राजेश जैन, कवयित्री ममता किरण, कलाकार साजदा खान, हिमालयन रन एंड ट्रैक के संपादक चद्रशेखर पांडे, साहित्यकार अतुल प्रभाकर, लहरीराम सहित अनेक रचनाकार और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे.

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