-रचना प्रियदर्शिनी-
जब बच्चे हुए, तो यह तक पता नहीं था कि बच्चे हुए कैसे? जब वो मुझे मम्मी कहकर बुलाते, तो बड़ा अजीब लगता था. मैं उन्हें मना करती थी कि मुझे मम्मी न बुलाया करें. मेरे बच्चों को तो आज तक नहीं पता कि उनकी मां पर क्या-क्या बीती है. न उन्होंने कभी पूछा, न ही मैंने कुछ बताया. दिमाग तो मालिक ने बहुत दिया. हुनर भी दिया. सिलाई, कढ़ाई, बुनाई…सब आता था, पर कदर किसी ने नहीं की. इसलिए समझाती हूं बेटा कि शादी कभी मत करियो. मन में बहुत कुछ है, जिसे मैं दुनिया को बताना चाहती हूं, पर पढ़ी-लिखी नहीं हूं न, वरना अपनी आत्म-कथा जरूर लिखती. लोग पढ़ते या नहीं मुझे नहीं पता, पर मेरे दिल का गुबार तो निकल जाता न.’ ये कहते-कहते वह दुखी और गंभीर हो जातीं. तब मैं उन्हें ढ़ाढस बंधाने के लिए बोलती- ‘अच्छा, छोड़िए न अम्मा. मैं कौन-सा शादी करने जा रही हूं. मुझे भी अपनी आजादी बहुत प्यारी है. आप सुनाइए कोई दूसरी बात.’
हां, साथ मिल कर बच्चे जरूर पैदा कर दिये. वो भी पैदा क्या किये. समझ ले, बस हो गये किसी तरह और फिर समय के साथ धीरे-धीरे बड़े भी हो गये. हमारे बीच तो कभी ज्यादा बात-चीत भी नहीं होती थी, फिर भी हमने निभा दिया. मैंने कभी अपनी कोई तमन्ना, कोई ख्वाहिश अपने आदमी के सामने नहीं रखी. न बाहर जाती थी. न किसी से बात करती थी, पर मुझे इस बात का किसी से कोई गिला-शिकवा भी नहीं. शायद मेरे रब को यही मंजूर था. अब इन्हें गुजरे 20 साल हो गये, फिर भी मुझे कभी इनकी कमी नहीं खली. कभी दुख भी नहीं हुआ जाने का. मैंने सत्संग का रास्ता अपना लिया और पूरी जिंदगी अपने बाबाजी के सहारे गुजार दिया. आज बच्चे इज्जत करते हैं. कमरे के किराये पर चढा रखा है. उस पैसे से मेरा आराम से गुजारा हो जाता है. मुझे कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ी. दो बार हार्ट-अटैक भी आ चुका है अब तक, पर शायद मालिक ने अभी चंद सांसें और लिख रखी हैं, इसलिए जिंदा हूं. खुश हूं.
