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Home Prabhat Khabar Special राघव चड्ढा विवाद की क्या है असली कहानी, क्यों अरविंद केजरीवाल से बन गई हैं दूरियां?

राघव चड्ढा विवाद की क्या है असली कहानी, क्यों अरविंद केजरीवाल से बन गई हैं दूरियां?

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राघव चड्ढा विवाद की क्या है असली कहानी, क्यों अरविंद केजरीवाल से बन गई हैं दूरियां?
राघव चड्ढा

Raghav Chadha vs AAP : आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा पर पार्टी ने मोदी सरकार से समझौता करने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला किया है. पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल से कई ऐसे पोस्ट किए गए हैं, जो चड्ढा को डरपोक और समझौता करने वाला बताते हैं. इन सोशल मीडिया पोस्ट और पार्टी द्वारा उन्हें राज्यसभा के उप नेता पद से हटाये जाने की आखिर वजह क्या है और क्यों राघव चड्ढा अब पार्टी के चहेते नहीं रहे, यह समझने की कोशिश अगर करें, तो पाएंगे कि यह सबकुछ अचानक नहीं हुआ है, इसकी पृष्ठभूमि काफी पहले से तैयार हो रही थी.

राघव चड्डा पर पार्टी लाइन से अलग व्यवहार करने का आरोप क्यों लगा?

राघव चड्डा पर पार्टी ने यह आरोप लगाया है कि वे पार्टी लाइन से अलग जाकर व्यवहार कर रहे थे. जब पार्टी का रुख केंद्र सरकार पर तीव्र हमले का था, तो वे विदेश में छुट्टी मना रहे थे. जब केंद्र सरकार ने अरविंद केजरीवाल को साजिश के तहत जेल भेजा, उस वक्त भी उनका रवैया पार्टी लाइन से अलग रहा. राघव चड्ढा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से दूर होते दिख रहे हैं और अनुशासन का भी पालन नहीं करते हैं. 

संसद में सॉफ्ट मुद्दे उठाकर अपना पीआर कर रहे

आम आदमी पार्टी का यह भी आरोप है कि राघव चड्ढा ने ना सिर्फ पार्टी लाइन का उल्लंघन किया, बल्कि वे संसद में सॉफ्ट मुद्दे उठाकर अपना पीआर कर रहे थे. उन्हें पार्टी लाइन से कुछ लेना-देना नहीं था. अरविंद केजरीवाल का यह कहना है कि आम जनता के मुद्दों के लिए अगर आपको जेल जाना पड़े, तो जाएं, लेकिन समझौता ना करें. राघव चड्ढा ने पार्टी के इस मूलमंत्र का त्याग कर दिया और वे डर से समझौते करने लगे.

राघव चड्ढा ने हाल में संसद में उठाए कई सॉफ्ट मुद्दे

राघव चड्ढा ने हाल के दिनों में संसद में कई ऐसे मुद्दे उठाए, जो आम आदमी से जुड़े तो थे, लेकिन उनपर विवाद की संभावना काफी कम थी. जैसे एयरपोर्ट पर महंगे समोसे का मुद्दा, पेटरनिटी लीव का मुद्दा, ट्रैफिक की दिक्कतों का मुद्दा,टेलीकाॅम कंपनियों की मनमानी का मुद्दा और गिग वर्कर की परेशानियों का मुद्दा भी शामिल था. अब इन मुद्दों पर अगर गौर करें, तो पाएंगे कि हर मुद्दा आम आदमी से कनेक्ट करता है, इसलिए आम आदमी पार्टी का यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता है कि वे आम आदमी के मुद्दों को छोड़ चुके हैं. हां यह बात जरूर हो सकती है कि पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया हो और उसी के तहत राघव चड्ढा के खिलाफ कार्रवाई हुई है.

राघव चड्ढा ने पार्टी को दी चेतावनी

आम आदमी ने जब राघव चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटाया तो उन्होंने 3 अप्रैल को अपना वीडियो मैसेज जारी कर पार्टी से पूछा कि कि आखिर उनका दोष क्या है? वे अकसर ऐसे मुद्दे उठाते रहे हैं, जिन्हें उठाने से आम आदमी का फायदा हुआ है, फिर आम आदमी पार्टी का इसमें क्या नुकसान है? उन्होंने कहा कि राज्यसभा सचिवालय को यह कहना कि राघव चड्ढा को बोलने का मौका ना दिया, मुझे चुप कराने की कोशिश है, लेकिन मैं पार्टी से यह कहना चाहता हूं कि मैं हारने वाला नहीं हूं. उन्होंने कहा कि मैं वह दरिया हूं, जब समय आने पर सैलाब भी बन जाता है.

क्या पार्टी से निकाले जा सकते हैं राघव चड्ढा?

आम आदमी पार्टी की नीतियां जिस तरह की रही हैं, वहां सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल हैं. पिछले कुछ उदाहरणों को देखें, ते यह पाएंगे कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति ज्यादा चर्चित होता है, तो उसे बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया है. ऐसे उदाहरणों में कुमार विश्वास, योगेंद्र यादव जैसे नाम प्रमुख हैं.स्वाति मालीवाल जैसे चेहरे को भी साइड लाइन करने का किस्सा बहुत चर्चित रहा है, जबकि शुरुआत में वे अरविंद केजरीवाल की काफी करीबी रही थीं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि अब बारी राघव चड्ढा की है. राघव चड्ढा एक युवा नेता हैं. क्लीन फेस की वजह से शहर में उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता भी रही है, जो अब उनके खिलाफ काम कर रही है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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