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Home Prabhat Khabar Special क्या है 600 ईसाई- हिंदू परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विवाद? विरोध जारी

क्या है 600 ईसाई- हिंदू परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विवाद? विरोध जारी

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क्या है 600 ईसाई- हिंदू परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विवाद? विरोध जारी
वक्फ बोर्ड के खिलाफ प्रदर्शन करते मुनंबम के निवासी

Waqf Land Dispute : वक्फ एक्ट में संशोधन के लिए जब मोदी सरकार बिल लेकर आई तो देश में वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर नई बहस छिड़ गई. अभी यह बिल संयुक्त संसदीय समिति के पास है और इसपर विचार-विमर्श किया जा रहा है. इसी बीच केरल में वक्फ की संपत्ति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. इस विवाद की वजह से मुनंबम तट की 404 एकड़ पर रहने वाले लोग आंदोलन कर रहे हैं.

मुनंबम भूमि विवाद चर्चा में क्यों?

मुनंबम तट के 404 एकड़ भूमि पर केरल वक्फ बोर्ड ने अपना दावा ठोका है. इस भूमि पर वक्फ बोर्ड के दावे के बाद वहां पीढ़ियों से रह रहे 600 परिवार गुस्से में हैं और अपनी जमीन को बचाने के लिए वे आंदोलन भी कर रहे हैं. इस जमीन पर रहने वाले 600 परिवारों में से 400 ईसाई है और बाकी 200 परिवार हिंदू है जो पिछड़े वर्ग से आते हैं. यह 600 परिवार वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहा है और इस बात पर आपत्ति जता रहा है कि मुस्लिम संगठन को क्यों जमीन की डीड यानी मालिकाना हक के दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं. मुनंबम तट के लोगों ने जब विरोध किया, तो इस मामले को बीजेपी ने अपना एजेंडा बना लिया और केरल में होने वाले उपचुनावों के प्रचार के दौरान उसे उठाया भी. चूंकि केरल विधानसभा ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए वक्फ एक्ट संशोधन विधेयक का विरोध करने और उसे वापस लेने की मांग करते हुए एक विधेयक पारित किया था, इसलिए बीजेपी ने मुनंबम तट के भूमि विवाद को चुनावी मुद्दा बनाया.

कहां से शुरू हुआ मुनंबम भूमि विवाद?

Explainer Waqf 1
वक्फ बोर्ड के खिलाफ प्रदर्शन करते कैथोलिक ईसाई परिवार

मुनंबम तट केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित है और जिस भूमि को लेकर विवाद है उस भूमि पर पीढ़ियों से मछुआरा समुदाय रहता आया है. ईसाई परिवार लैटिन कैथोलिक समाज का है, जबकि हिंदू पिछड़े वर्ग के हैं. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार विवाद की शुरुआत 1902 में हुई थी.  त्रावणकोर के शाही परिवार ने  404 एकड़ भूमि जिसपर मछुआरे वर्षों से रहते थे उसे अब्दुल सथर मूसा सैत नामक एक व्यापारी को पट्टे पर दी थी. वह व्यापारी कोच्चि के पास मट्टनचेरी में रहता था. 1948 में उसके दामाद मोहम्मद सिद्दीकी सैत ने पट्टे पर दी गई भूमि को अपने नाम करा लिया. उसके बाद उसने वह पूरी जमीन कोझीकोड के एक काॅलेज को सौंप दी, जो मुसलमानों को शिक्षा देकर मजबूत बनाने में जुटा था. भूमि दान किए जाने के बाद इसे 1950 में वक्फ डीड के रूप में रजिस्टर कर लिया गया.

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मुनंबम भूमि विवाद कब शुरू हुआ?

मुनंबम तट पर रहने वाले मछुआरों की परेशानी तब बढ़ी जब काॅलेज प्रबंधन ने उन्हें जमीन से बेदखल करने की कोशिश की. इस भूमि पर पीढ़ियों से रहने वाले लोगों के पास जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कोई दस्तावेज मौजूद नहीं हैं. 1960 में जब कानूनी लड़ाई शुरू हुई, तो काॅलेज प्रबंधन ने अदालत के बाहर समझौता किया और वह जमीन वहां रहने वालों को ही बेचने का फैसला किया. जब जमीनों की बिक्री हुई तो उसमें यह नहीं बताया गया कि वह जमीन वक्फ बोर्ड की थी. केरल में वक्फ बोर्ड के खिलाफ कई मामले दर्ज हुए थे, जिसके बाद वहां की सरकार ने 2008 में रिटायर्ड जज एमए निसार की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया, जिसमें मुनंबम तट की जमीन को वक्फ बोर्ड की जमीन बताया गया. 2019 में वक्फ बोर्ड ने राज्य सरकार के राजस्व विभाग को यह निर्देश दिया कि वे जमीन पर रह रहे मछुआरा समुदाय से भूमि कर ना वसूले क्योंकि यह वक्फ बोर्ड की संपत्ति है. इसके बाद विवाद बढ़ता गया और अब कैथोलिक ईसाई इसके खिलाफ सड़क पर हैं और उन्हें बीजेपी का भी साथ मिल रहा है. 

वक्फ बोर्ड दूसरे की जमीन पर दावा नहीं करता : साजिद रशीदी

दिल्ली वक्फ बोर्ड के इमाम साजिद रशीदी का कहना है कि वक्फ बोर्ड ऐसी किसी जमीन पर अपना दावा नहीं करता, जो उसके नाम पर दर्ज ना हो. देश में जितनी भी वक्फ संपत्ति है वह 1970 के गजट में दर्ज है. हम सिर्फ उन्हीं जमीनों पर अपना मालिकाना हक चाहते हैं. अगर हमारी जमीन पर वर्षों से किसी का कब्जा है, तो हम क्या करें अपना हक छोड़ दें? वक्फ बोर्ड तो इस बात पर भी राजी है कि अगर कोई पीढ़ियों से वहां रह रहा है तो वो परिवार या समुदाय जमीन को खाली ना करे, बस बोर्ड द्वारा निर्धारित किराया दे दे. जिस भी जमीन पर बोर्ड अपना दावा पेश कर रहा है, सबके कागज हमारे पास हैं. कागजात सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं और यह सर्वे के बाद हमें मिला है. अगर सरकार ने गलत सर्वे किया है तो इसमें बोर्ड की क्या गलती है? इसपर भी अगर कोई परिवार बोर्ड की संपत्ति से हटना नहीं चाहता है तो वह कोर्ट जाए मामले का निपटारा वहां होगा.

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FAQ : वक्फ बोर्ड क्या है?

वक्फ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ठहरना या कायम रहना. वहीं विशेष अर्थ होता है अल्लाह के नाम पर दान की गई वस्तु यानी जिसका उद्देश्य परोपकार हो. वक्फ बोर्ड उन चीजों की निगरानी करता है जो अल्लाह के नाम पर दान की गई हो.

वक्फ एक्ट में संशोधन के लिए लाया गया बिल किस समिति के पास भेजा गया है?

संयुक्त संसदीय समिति.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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