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Home Prabhat Khabar Special Dhanteras 2024 :  क्या है धनतेरस, समुद्र मंथन से क्या है रिश्ता?

Dhanteras 2024 :  क्या है धनतेरस, समुद्र मंथन से क्या है रिश्ता?

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Dhanteras 2024 :  क्या है धनतेरस, समुद्र मंथन से क्या है रिश्ता?

what is dhanteras :  धनतेरस के साथ ही पांच दिवसीय दीपावली के त्योहार की शुरुआत हो जाती है, जिसका अंत भाई दूज के साथ होता है. धनतेरस का त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. धनतेरस से कई तरह की परंपराएं जुड़ी हैं, कहीं इस त्योहार के अवसर पर सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है, तो कहीं बरतन खरीदे जाते हैं. धनतेरस को भगवान धनवंतरि का जन्मदिवस भी माना जाता है.

क्या है धनतेरस (what is dhanteras)

धनतेरस को भगवान धनवंतरि का जन्मदिवस माना जाता है. चूंकि भगवान धनवंतरि को चिकित्सा और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है इसलिए धनतेरस के दिन सुख, समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है. धनवंतरि को आयुर्वेद का जनक भी माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने मिलकर मंदार पर्वत और वासुकी नाग की मदद से समुद्र मंथन किया था, तो उससे 14 रत्न निकले थे. उन्हीं 14 रत्नों में से एक भगवान धनवंतरि भी थे, जिनका अवतरण दिवस धनतरेस है. वे समुद्र मंथन के दौरान हाथ में रत्नजड़ित औषधि कलश लिए उत्पन्न हुए थे.

समुद्र मंथन और धनतेरस का संबंध

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अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था जो कई वर्षों तक चला था, उस मंथन में 14 रत्न निकले थे. ये रत्न इस प्रकार हैं- सबसे पहले निकला था हलाहल विष जिसके ताप से देवता और असुर दोनों घबरा गए थे, उसे भगवान शंकर ने अपने गले में धारण किया था. उसके बाद कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा अप्सरा, देवी लक्ष्मी, वारुणी यानी मदिरा, चंद्रमा, पारिजात पुष्प, पांचजन्य शंख, धन्वंतरि और अंतिम में अमृत की प्राप्ति हुई थी.  ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन धन प्राप्ति के लिए धन की देवी लक्ष्मी और देवताओं के खजांची कुबेर की भी पूजा की जाती है, ताकि घर में धन की कमी ना हो. देवी लक्ष्मी जब समुद्र मंथन से प्रकट हुईं, तो उनके हाथ में सोने का कलश था जिससे सोने के सिक्कों की बारिश हो रही थी.

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धनतेरस से क्यों जुड़ी है बरतन और आभूषण खरीदने की परंपरा

भगवान धनवंतरि जब समुद्र मंथन से प्रकट हुए तो वे हाथ में औषधि का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए थे, जो रत्नजड़ित था. इसी वजह से धनतेरस के दिन बरतन और आभूषण खरीदने की परंपरा है, ताकि घर में सुख-संपत्ति का वास हो. चूंकि धन की देवी माता लक्ष्मी हैं, इसलिए इस दिन उनकी पूजा का भी विधान है.

धनतेरस पर यमराज के नाम का दीपक क्यों जलाते हैं?

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धनतेरस के दिन बेहतर स्वास्थ्य की कामना के साथ ही अकाल मृत्यु से बचने के लिए यमराज की पूजा भी की जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार एक राजा हिम थे जिनके घर बेटे का जन्म कई वर्षों के इंतजार के बाद हुआ. लेकिन जब बेटे का जन्म हुआ, तो ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि विवाह के चार महीने बाद ही उसकी मौत हो जाएगी. राजा हिम ने अपने बेटे को लड़कियों से दूर रखा, बावजूद इसके उसने राजा हंस की बेटी से विवाह कर लिया. जब उस राजकुमारी को पति की मौत से जुड़ी भविष्यवाणी के बारे में पता चला, तो उसने उस तिथि को अपने कमरे में सोने-चांदी और जवाहारात के ढेर लगा दिए. इतने सोने के सिक्के रखे कि कमरा जगमगा उठा. उसी वक्त यमराज राजकुमार के प्राण लेने सांप के वेश के आए. लेकिन उनकी आंखें चौंधिया गई. राजकुमारी अपने पति को कहानियां सुना रही थी और उनके लिए गाने गा रही थी, जिसे यमराज भी सुनने में मग्न थे. अचानक यमराज को ध्यान आया कि वह समय तो बीत चुका जब उन्हें राजकुमार के प्राण हरने थे, तो वे वहां से चले गए, लेकिन यह कहकर भी गए कि जो भी कार्तिक मास की त्रयोदशी को उनकी पूजा करेगा और दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा उनकी अकाल मृत्यु नहीं होगी. यही वजह है कि धनतेरस के दिन बर्तन खरीदे जाते हैं और आभूषण भी खरीदने की परंपरा है. साथ ही यमराज के नाम का दीपक भी जलाया जाता है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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