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क्या है परिसीमन, जिसे लेकर देश में हंगामा है बरपा?

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क्या है परिसीमन, जिसे लेकर देश में हंगामा है बरपा?
लोकसभा में पीएम मोदी

Delimitation Bill 2026 : परिसीमन क्या है? इस सवाल का जवाब आज पूरा देश जानना चाहता है. इसकी वजह यह है कि आज संसद में इस मुद्दे को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हो रही है. विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार देश में परिसीमन अपने हिसाब से कराकर उसका राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में यह कह रहे हैं कि वे नारी शक्ति को उनका हक देना चाहते हैं, जो इतने साल से रुका पड़ा है. उनका इसमें कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं है. आइए समझते हैं क्या है परिसीमन, जिसे लेकर देश में हंगामा है बरपा?

परिसीमन क्या है?

किसी भी लोकतांत्रिक देश में उसके नागरिक का वोट बहुत महत्वपूर्ण होता है. भारत जैसे देश में जहां का संविधान नागरिकों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता है, वहां प्रत्येक व्यक्ति का वोट एक समान और किसी को कम या ज्यादा ना समझा जाए, इसके लिए परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाती है. परिसीमन की प्रक्रिया के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या और उनकी सीमाओं का निर्धारण होता है. इसी प्रक्रिया के तहत अलग-अलग चुनाव क्षेत्र बनाए जाते हैं. चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है. इसका उद्देश्य यह तय करना है कि हर विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में जनसंख्या एक समान हो. जनसंख्या समान होने से क्षेत्र विशेष के लोगों का प्रतिनिधित्व समान होता है.

परिसीमन की जरूरत क्यों पड़ती है?

जनसंख्या का बढ़ना एक बहुत ही स्वाभाविक प्रक्रिया है. ऐसे में अगर किसी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या में अधिक वृद्धि हो जाए, लेकिन वहां की सीट एक ही रहे, तो वहां के लोगों का प्रतिनिधित्व सदन में कम हो जाएगा.इसी स्थिति को बदलने और सबको एक जैसा महत्व देने के लिए देश में परिसीमन किया जाता है, जिसके द्वारा समय-समय पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की संख्या और और उनकी सीमाओं का पुनर्निधारण किया जाता है. कहने का अर्थ यह है कि अगर किसी संसदीय क्षेत्र में जनसंख्या ज्यादा बढ़ जाए, तो उस सीट को दो टुकड़ों में बांटकर दो सीट बनाया जा सकता है.

कैसे होता है परिसीमन?

परिसीमन को संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त है यानी यह एक कानूनी प्रक्रिया है. परिसीमन की पहली शर्त है जनगणना. परिसीमन तभी हो सकता है जब देश में नई जनगणना हो. नई जनगणना से यह पता चल जाता है कि किस क्षेत्र की आबादी कितनी है. जनगणना के बाद सरकार परिसीमन आयोग का गठन करती है, जो जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से अनुपात तय करती है और सीटों की संख्या और उनकी सीमाएं तय की जाती हैं. आयोग जब सीटों की संख्या और सीमाएं तय कर लेता है, तो जनता और राजनीतिक दलों से सुझाव मांगता है. सुझाव के आधार पर आयोग उनमें जरूरी होने पर संशोधन भी करता है. आयोग के फैसले को आमतौर पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जाती है.

परिसीमन को लेकर क्या कहता है संविधान?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81, 82 और 170 के तहत परिसीमन एक कानूनी प्रक्रिया है. अनुच्छेद 81 लोकसभा सीटों से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या और उनकी सीमाओं के निर्धारण से जुड़ा है. जबकि अनुच्छेद 82 में यह व्यवस्था है कि हर जनगणना के बाद संसद परिसीमन के लिए कानून बना सकती है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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