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Home Prabhat Khabar Special उत्तराखंड में खीरगंगा नदी ने लाई तबाही, जानिए बादल फटने पर कितने मिमी होती है बारिश?

उत्तराखंड में खीरगंगा नदी ने लाई तबाही, जानिए बादल फटने पर कितने मिमी होती है बारिश?

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उत्तराखंड में खीरगंगा नदी ने लाई तबाही, जानिए बादल फटने पर कितने मिमी होती है बारिश?
उत्तराखंड में खीरगंगा नदी का क्रोध

Uttarkashi Cloudburst : उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बादल फटने की घटना से अबतक 4 लोगों की मौत हुई है और आशंका जताई जा रही है कि 100 से अधिक लोग लापता हैं. बादल फटने की घटना ऊंचाई पर हुई जिससे खीरगंगा नदी में पानी का सैलाब आ गया और भयंकर तबाही हुई. बताया जा रहा है कि कई सड़क पानी में बह गए और कई गाड़ियां फंस गईं.राहत और बचाव कार्य जारी है और अबतक 120 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है.

क्या है बादल फटने की घटना?

बादल फटना उस प्राकृतिक घटना को कहते हैं, जिसमें अचानक किसी खास जगह पर बहुत अधिक मात्रा में वर्षा होती है. वर्षा इतनी अधिक होती है कि उसके प्रभाव से भारी बाढ़ और भूस्खलन की घटना होती है. इसके प्रभाव से जान और माल की भारी हानि होती है. जब किसी क्षेत्र में गर्मी और नमी बहुत अधिक हो जाती है, तब वहां अस्थिर वायुमंडलीय परिस्थितियां बनती हैं, जो बादल फटने की वजह बनता है.

कैसे फटता है बादल?

बादल फटने की घटना में एक ही जगह पर एक घंटे में 100 मिमी से अधिक बारिश हो जाती है. यह प्राकृतिक क्रिया तब होती है जब पृथ्वी की सतह से गर्म हवा उठकर ऊपर की ओर जाती है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हवा जब ऊपर जाती है, तो अपने साथ नमी भी लेकर जाती. ऊंचाई पर यह भाप ठंडी होकर संघनित होने लगती है यानी वे एक साथ जुड़ जाते हैं और जलकण में तब्दील हो जाते हैं. कई बार ये भाप बर्फ के कणों में भी बदल जाते हैं. उसके बाद शुरू होती है बादल बनने की प्रक्रिया. संघनित होने के बाद ये जलकण बादल में तब्दील हो जाते हैं और बड़े बादल का रूप ले लेते हैं. जब हवा की गति अधिक होती है और नमी बहुत ज्यादा होती है, तो जलकण बादल के अंदर ही एकत्रित होते रहते है, नीचे नहीं गिरते हैं, लेकिन एक समय ऐसा आता है जब बादल नमी को और बर्दाश्त नहीं कर पाता है, जिसकी वजह से अचानक पानी बादल से गिरने लगता है और पानी की बौछार गिरने लगती है और इस क्रिया को बादल फटना कहते हैं.

बादल फटने की घटना किन इलाकों में ज्यादा होती है

बादल फटने की घटना पर्वतीय इलाकों में ज्यादा होती है, इसकी वजह यह है कि पहाड़ों से टकराकर हवा ऊपर उठती है, जिससे भारी मात्रा में संघनन होता है. प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और पर्यावरणविद्‌ नीतीश प्रियदर्शी बताते हैं कि पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की घटना ज्यादा इसलिए होती है कि पहाड़ों की वजह से बादल नीचे ही फंस जाते हैं और उनमें संघनन शुरू हो जाता है. चूंकि यहां नमी ज्यादा होती है, इसलिए बादल एक सीमा के बाद नमी को संभाल नहीं पाते हैं और बादलों से पानी गिरना शुरू हो जाता है, जिसे बादल फटना कहा जाता है. यही वजह है कि हिमालय के क्षेत्रों में बादल फटने की घटना ज्यादा होती है.

बादल फटने की घटना प्राकृतिक है या मानव निर्मित

बेशक बादल फटने की घटना प्राकृतिक है, लेकिन विगत कुछ वर्षों में इसमें जितनी तेजी आई है, वह मानवनिर्मित है. भूवैज्ञानिक नीतीश प्रियदर्शी बताते हैं कि धरती लगातार गर्म हो रही है, जिसकी वजह से वाष्पीकरण ज्यादा हो रहा है और बादल काफी नीचे ही बन रहे हैं. साथ ही पहाड़ों को काटकर मानव जो निर्माण कर रहा है, उसकी वजह से भी पहाड़ कमजोर हो रहे हैं और मिट्टी ढीली हो रही है. नदियां जब ऊपर से नीचे की ओर आती हैं, तो बारिश के मौसम में वे काफी गाद भी ला रही हैं. टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम कई तरह के निर्माण कार्य किए गए हैं, जिसने नदियों के बहाव को बाधित किया है. अब जबकि नदियों का बहाव बाधित है, तो नदियां क्रोधित हैं और उसके प्रकोप का असर सबको दिख रहा है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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