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Home Prabhat Khabar Special ईरान युद्ध : सीजफायर में बाधा बन सकते हैं ये 3 कारण, क्या स्थायी शांति कायम कर पाएगी शांतिवार्ता

ईरान युद्ध : सीजफायर में बाधा बन सकते हैं ये 3 कारण, क्या स्थायी शांति कायम कर पाएगी शांतिवार्ता

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ईरान युद्ध : सीजफायर में बाधा बन सकते हैं ये 3 कारण, क्या स्थायी शांति कायम कर पाएगी शांतिवार्ता
ईरान युद्ध रूका, ट्रंप ने सीजफायर पर खुशी जताई

US Iran War Ceasefire : अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के लिए हुए सीजफायर को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है, पर विश्व के नेताओं को इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा है कि यह सीजफायर स्थायी शांति लेकर आएगा. दरअसल, 10 अप्रैल से ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता होने वाली है, यह वार्ता कितनी सफल होगी यह तो आने वाला वक्त बताएगा. क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के रवैये पर पूरी दुनिया को भरोसा नहीं है. वहीं मिडिल ईस्ट में शांति कायम करने के लिए सभी पक्षों को शांति के लिए राजी करना होगा और आपसी बातचीत भी बढ़ाना होगा, पर यह एक बहुत बड़ी समस्या है, क्योंकि लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने को इजरायल तैयार नहीं है.

1. क्या सीजफायर की राह में बाधा है लेबनान?

मंगलवार की रात जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की घोषणा हुई, तो पूरे मिडिल ईस्ट के अलावा विश्व ने भी राहत की सांस ली. लगभग 40 दिन से जारी इस युद्ध के खत्म होने का इंतजार पूरा विश्व कर रहा है, लेकिन इस युद्ध में शामिल पक्ष अपने-अपने हितों को लेकर झुकने के मूड में नहीं हैं. यही वजह है कि इजरायल ने यह साफ कर दिया है कि वह हिजबुल्लाह की समाप्ति के लिए लेबनान के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा. वह यह मानता है कि लेबनान के खिलाफ कार्रवाई इस सीजफायर का हिस्सा नहीं है. हिजबुल्लाह एक ऐसा संगठन है, जो हमेशा ही इजरायल पर हमला करता रहता है. अपनी सीमा को हिजबुल्लाह से सुरक्षित करने के लिए इजरायल, लेबनान के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, क्योंकि लेबनान को हिजबुल्लाह के ठिकानों में से एक माना जा सकता है. हिजबुल्लाह ने इजरायल पर पहले हमला किया था, जिसके जवाब में इजरायल ने भी उस पर हमला शुरू किया था. अब जबकि सीजफायर हो गया है, ईरान चाहता है कि उसके सहयोगियों पर हमले रोके जाएं, लेकिन इजरायल का यह कहना है कि यह सैन्य कार्रवाई अलग है. इससे ईरान युद्ध का कोई संबंध नहीं है. दोनों देशों द्वारा दिये जा रहे तर्क स्थायी सीजफायर की दिशा में बड़ी बाधा साबित हो सकते हैं.

2. क्या हैं सीजफायर की शर्तें

Iran-War-Peace-Talk
ईरान में शांति चाहती है पूरी दुनिया

ईरान और अमेरिका के बीच जो सीजफायर हुआ है, वह शर्तों के तहत हुआ है. सीजफायर को स्थायी बनाने के लिए इस्लामाबाद में शांतिवार्ता होगी. ईरान ने अपनी 10-सूत्रीय योजना में पूरे क्षेत्र में हमले रोकने की बात कही है. इसमें उसके सहयोगी समूह भी शामिल हैं. सीजफायर को स्थायी बनाने में सबसे बड़ा पेच यहीं फंसता है, क्योंकि इजरायल, लेबनान पर हमला बंद करने के मूड में बिलकुल भी नहीं है. इजरायल दक्षिणी लेबनान में ग्राउंड ऑपरेशन चला रहा है, ताकि वह अपने लिए एक सुरक्षित क्षेत्र बना सके, जहां हिजबुल्लाह आक्रमण ना कर सके. ईरान की शर्तों की वजह से इससे सीजफायर पर असर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट को ईरान ने अभी तो खोला है, लेकिन वह कबतक इसपर कायम रहेगा, यह कहना मुश्किल है. सीजफायर के लिए होर्मुज स्ट्रेट को खोलना अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त है.

3. ईरान और अमेरिका के बीच विश्वास की कमी

ईरान युद्ध में जो सीजफायर हुआ है, उसमें सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है. दोनों ही देश एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते हैं. युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने यह कहा कि वह आम लोगों को इसमें शामिल नहीं करेगा, लेकिन स्कूल पर हमले हुए और टीचर और बच्चों को मिलाकर 175 लोगों की जान गई. हमले रोकने की बात हुई, लेकिन हमले जारी रहे. इस तरह की कार्रवाइयों की वजह से दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है. शांति वार्ता के दौरान दोनों का पक्षों का भरोसा काफी अहम होगा, लेकिन यह बहुत मजबूत नहीं है. सीजफायर की घोषणा के साथ ही ऐसी सूचना भी आई है कि कई देशों में मिसाइल अलर्ट पर हैं, यह स्थिति भी खतरनाक प्रतीत होती है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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