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Home Prabhat Khabar Special शांतिवार्ता के लिए शर्तों में फंसे हैं ईरान और अमेरिका, अविश्वास के माहौल में हो सकती है शटल डिप्लोमेसी

शांतिवार्ता के लिए शर्तों में फंसे हैं ईरान और अमेरिका, अविश्वास के माहौल में हो सकती है शटल डिप्लोमेसी

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शांतिवार्ता के लिए शर्तों में फंसे हैं ईरान और अमेरिका, अविश्वास के माहौल में हो सकती है शटल डिप्लोमेसी
जेडी वेंस, शहबाज शरीफ और गालिबफ

US Iran Islamabad Talks : ईरान युद्ध को रोकने के लिए इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका और ईरान के बीच की शांतिवार्ता पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है. हालांकि दोनों पक्ष के लोग पाकिस्तान पहुंच गए हैं और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात कर भी ली है. न्यूज एजेंसी एएफपी के हवाले से जो सूचना सामने आ रही है, उसके अनुसार वार्ता इन डायरेक्ट होगी. यानी दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और मध्यस्थ के जरिए बातचीत होगी. आइए समझते हैं वार्ता का क्या होगा फार्मेट और इस वार्ता के क्या हो सकते हैं परिणाम.

बातचीत आमने-सामने होगी या फिर मिडिलमैन के जरिए

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबफ ने कहा है कि उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं है, इसी वजह से ऐसी सूचना विभिन्न न्यूज एजेंसियों से सामने आई है कि शांतिवार्ता मध्यस्थ के माध्यम से होगी और दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग-अलग कमरों में बैठेंगे. शटल डिप्लोमेसी(मध्यस्थ के माध्यम से बातचीत)कोई नई बात नहीं है, कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में इस तरह की बातचीत होती रही है. हालांकि, पाकिस्तान के प्रमुख अखबार दि डाॅन के अनुसार 1979 के बाद ईरान और अमेरिका के बीच पहली सीधी उच्च-स्तरीय बातचीत हो सकती है. अगर ऐसा होता है, तो यह दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव माना जाएगा. चूंकि अबतक बातचीत के स्वरूप को लेकर स्पष्टता नहीं है, इसलिए शांतिवार्ता को लेकर सस्पेंस बढ़ गया है.

1979 के बाद क्यों अहम है ईरान और अमेरिका की बातचीत?

ईरानी इस्लामिक क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं. इसी घटना के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध लगभग टूट गए थे. इसके बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत आमतौर पर इनडायरेक्ट ही होती आई है. ऐसे में अगर इस बार सीधी बातचीत होती है, तो यह दशकों पुरानी कूटनीतिक दूरी को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.

शांतिवार्ता की सफलता में बाधक हैं दोनों पक्षों की शर्तें

ईरान और अमेरिका दोनों यह चाहते हैं कि शांतिवार्ता से पहले कुछ शर्तों पर सहमति बन जाए. ईरान यह चाहता है कि अमेरिका लेबनान में युद्धविराम करे और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह ईरान की फ्रोजन की संपत्ति को रिलीज करे. हालांकि कुछ रिपोर्ट्‌स में यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिका एसेट रिलीज करने पर सहमत है, लेकिन व्हाइट हाउस ने इसे साफतौर पर खारिज कर दिया है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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